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शिक्षा का खेल

August 29, 2015 01:17 PM

24 अगस्त जनसत्ता के सम्पादकीय आलेख में रमेश दवे ने समाज के शिक्षा जैसे अति महत्वपूर्ण मुद्दें पर कुछ बाते कही हैं। परन्तु दवे जी मामला केवल परीक्षा होने या ना होने, शिक्षकों को नकारा बता देने और गुणवत्ता की बात कह देना मात्र जितना सरल नहीं है? शिक्षा का सवाल बड़ा सवाल है जिसको व्यापक परिपे्रक्ष्य में देखने, समझने व हस्तक्षेप करने की जरुरत है। हाल ही में इलाहाबाद हाई कोर्ट के शिक्षा सम्बन्धी आदेश ने समाज के गलियारों में लोगों को एक बार फिर सोचने, बोलने व अनेकों सलाहें देने का मौका प्रदान किया है। चर्चाओं के बाजार में लोग इस बात से बिल्कुल इत्तिफाक रख रहे हैं कि सरकारी कर्मचारियों, अधिकारियों, अफसरों व नेताओं के बच्चे जब तक सरकारी स्कूलों में दाखिल नहीं होगें तब तक इन स्कूलों का उद्धार होना मुश्किल है! लोग ठीक ही तो कह रहे है कि क्यों ना यह प्रयोग पूरे देश में ही आजमाया जाए क्योंकि आज के दिन राजनिति कुछ भी करने की ताकत रखती है! लोगों का तो यहां तक कहना है कि देश के तमाम निजि स्कूलों व शिक्षण संस्थाओं को सरकार द्वारा अपने नियंत्रण में ले लेना चाहिए! क्योंकि शिक्षा कोई व्यवसाय नहीं है जिससे अनाप-शनाप पैसा कमाया जाए? व्यवहार बता रहा है कि आज शिक्षा व स्वास्थ्य बाजार में सबसें लाभप्रद व्यवसाय है! जहां कोई सौदेबाजी भी नहीं होती है!
शिक्षा विद श्रीनिवास व एनसीईआरटी के पूर्व अध्यक्ष जेएस राजपूत तथा शिक्षा क्षेत्र में सक्रिय तमाम लोगों व संस्थाओं ने हाई कार्ट के इस फैसले को प्रासंगिक माना है। इसमें कोई दोराय नहीं है कि आज देश का शिक्षा तंत्र पूरी तरह चरमरा गया हैं। ग्रामीण क्षेत्र के तमाम सरकारी स्कूल या तो बंद होने के कगार पर है या समाज की नजरों में इनकी उपयोगिता काफी कमजोर हो गई है क्योंकि यहां ना तो उचित संख्यां में शिक्षक है और ना ही अन्य आवश्यक संसाधन है? सरकारी स्कूलों में पेयजल, शौचालय, बिजली, भवन आदि की असुविधाओं ने अपना स्थायी सा डेरा डाल रखा है। विशेष तौर पर ग्रामीण भारत के सरकारी स्कूलों की स्थिति तो हर तरह से बेहद ही चिंताजनक है? जहां आज केवल और केवल दलित जातियों, अल्पसंख्यकों व गरीब पिछड़ी आबादी के ही बच्चें जा रहे है। उपर से सरकार की 10वीं तक किसी को भी फेल ना करने की नीति दीमक की तरह शिक्षा को खोखला कर बर्बाद कर रही है। जातिय भेदभाव के चलते शिक्षकों का काम और भी आसान हो गया अब इनको पढाने की भी जरुरत नहीं है! जिसका परिणाम यह है कि 8-9वीं का बच्चा 3-4 कक्षा के गणित के सवाल भी हल नहीं कर पा रहा है। लगता है ये स्कूल महज 10वीं पास अनपढ़ केवल शारिरिक श्रम करने वाले युवाओं की फौज खड़ी कर रहें है! दरअसल तो हमारे राजनेताओं को भी ऐसी ही तो फौज चाहिए तभी तो कभी भी शिक्षा हमारे नेताओं की असल चिंता का मुद्दा नहीं बनता है! अगर गलती से कुछ सोच भी लिया तो केवल देशी-विदेशी पूंजीपतियों को कहां व कैसे लाभ होगा इसी के लिए तिकड़में रची जाती है। पूर्ण निजीकरण का जब कुछ सिरफिरे लोग विरोध करते है तो धूर्त, शातिर नेता लोग बीच का रास्ता अपनाते हुए ‘पीपीपी‘ ले आते है ताकि लोग चुप हो जाए? और फिर मामला ठन्डा पड़ने पर तीन ‘पी‘ मे से मौका मिलते ही दो ‘पी‘ काट देते है और फिर बाजार में एक ही ‘पी‘ का मोनोपोली हो जाती है! जिसको विकास नहीं विनाश कहा जाता है!
शिक्षा किसी भी समाज के विकास का मुख्य आधार होती है जिसके लिए यह आवश्यक है कि देश भर में एक समान शिक्षा प्रणाली लागू की जाए। यह राज्य की जिम्मेदारी है कि वह देश की आवाम को शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, रोजगार व खाना उपलब्ध कराएं। कानून बना देने, अच्छे भाषण देने मात्र से समसयाओं का हल हाने वाला नहीं है। व्यवहार में हमें अपनी सोच व कार्यद्दतियों को समानता आधारित मानवतावादी व न्यायप्रिय बनाना होगा। शायद तभी स्वच्छ, स्वस्थ व शिक्षित समाज बन पाएगा और अच्छें दिन भी तभी आऐगें?
70 के दशक के बाद के समय में राजनैतिक पार्टियों के चरित्र ने दिखा दिया है कि देश के बहुमत आवाम से इनका कोई सरोकार नहीं है। यहां बिड़ला-अंबानी समिति की शिक्षा पर राय समाज के अन्य हिस्सों की बजाय ज्यादा महत्वपूर्ण है? हो भी क्यों नहीं क्योंकि शिक्षा के असल स्टेकहोल्डर तो देशी विदेशी पूंजीपती ही है आमजन नहीं? आज शिक्षा को बाजारु वस्तु बनाया जा रहा है जिसका उपयोग केवल शुद्ध लाभ कमाने के उदेश्य से हो रहा है? कारपोरेटों व पूुजीपतियों के हितों को साधने वाली तमाम कवायदें कतई भी समाज हित में नहीं हो सकती है। हमारे शासकांे व राजनेताओं की नजर में विकास के मायने बम बनाने, मिशाइलें छोड़ने, जाति व धर्म के नाम पर अधिकाधिक दंगें भड़काने, न्यूनतम मानवीय अधिकारों की मांग करने वाली बेबस जनता पर गोलियां बरसानें और खुद बड़े-बड़े घोटाले करने से है ! यहां भूखे इंसान को गोली व बम आसानी से मिल सकता है पर दो सूखी रोटी नहीं? यहां लव जेहाद, घर वापसी व हिन्दु राष्ट्र बनाने के नाम पर देश को झोंका जा सकता है? परन्तु वास्तविकता यह है कि हमारे नेता नहीं चाहते कि देश वास्तव में शिक्षित बने. नहीं तो फिर इनकी दुकानें बन्द हो जाएंगी ? देश के भविष्य से ज्यादा इन्हें अपने व अपनी ना पैदा हुई संतानों के भविष्य की चिन्ता ज्यादा रहती है।
>> मुकेश कुमार, आर जेड एफ 1/224 गली न 2, महावीर एन्कलेव, नई दिल्ली - 110045

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