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प्रताड़ित स्त्रियाँ, दोषी कौन? परंपरा या समाज?

July 29, 2015 09:44 PM

 

||या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रुपें संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमो नमः||

“उस देवी को जो हर प्राणी में शक्ति रूप में विद्यमान है, उसे हम नमस्कार करते हैं, नमस्कार करते हैं, नमस्कार करते हैं, बार-बार नमस्कार करते हैं| “

उपरोक्त श्लोक में कौन हैं यह “देवी”? किसे हम बार-बार प्रणाम कर रहे हैं? कौन है यह शक्ति? क्या कभी सोचा है आपने? यह वो शक्ति वह प्रकृति है, स्त्री का वह स्वरूप है जिसे माँ शक्ति ने, माँ दुर्गा ने, माँ पार्वती ने दर्शाया है| जो कुछ भी इस भौतिक जगत में विद्यमान है, जो भी हमें दीखता है वह इसी शक्ति के कारण है| जो महाकाल की अर्धांग्नी हैं| जिसका स्वरुप हर स्त्री में बसता है| इस पृथ्वी पर स्त्री ही एक ऐसी जाति है जिसमें साक्षात् माँ दुर्गा का अक्स दीखता है| किन्तु क्या आज भी स्त्री के प्रति यही धारणा है? कहीं देखा है आपने ऐसा? अधिकतर का जवाब होगा “नहीं”| क्या आप बता सकते हैं की जवाब नकारात्मक क्यूँ है?

इसका कारण है स्त्री के साथ प्रति पल होता शोषण, दुराचार, अत्याचार| समाज का सर्वोच्च “शक्तिशाली वर्ग” ही आज सबसे “प्रताड़ित वर्ग” बना है| धर्म, परंपरा, नियमों आदि के नाम पर जो शोषण, जो अति इस वर्ग के साथ की जा रही है वह कहीं और नहीं| संस्कृति के नाम पर उसे चार दिवारी के अंदर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से बंदी बनाना, पति बच्चों की देखभाल का उत्तरदायित्व उसी का बताना,परंपरा के नाम पर पर्दा प्रथा, विधवा प्रथा, अछूत प्रथा का चलन; आदि से उसे प्रताड़ित किया जा रहा है| बच्चों की देखभाल का उत्तरदायित्व क्या पिता का नहीं? यहाँ यह प्रश्न उठ सकता है की पिता को कमाने की चिंता होती है, और गृहस्थी की देखभाल स्त्री का कार्य है, पुरुष कमाने में व्यस्त होने के कारण गृहस्थी पर ध्यान नहीं दे सकता| यह प्रश्न उठाने से पहले एक पल के लिए सोचना चाहिए कि जो महिलाएं घर और दफ्तर दोनों संभल रही हैं उनके लिए आप क्या कहेंगे? क्या वह कमाने की चिंता से मुक्त हैं? जब वह दोनों कार्य बखूबी निभा सकती है तो पुरुष क्यूँ नहीं? क्या इससे यह बात साबित नहीं होती की पुरुष स्त्री के समक्ष परिश्रम में कुछ भी नहीं? यहाँ किसी एक तबके को छोटा दिखाना मेरा उद्देश्य नहीं, वरन सच्चाई सामने लाना, झूठा अहंम, अभिमान तोड़ना है, स्त्री के अधिकार और उसकी क्षमता को बताना है जिसे हजारों सालों से चलती आ रही पुरुषवादी मानसिकता से दबाने का प्रयास किया गया और परंपरा का नाम देकर स्त्री को हर तरह से पिछड़ा बनाने की चेष्टा की गयी| क्यूंकि यह सभी जानते हैं की स्त्री को अगर बढ़ावा मिला तो वह सभी को पछाड़ सकती है| ऐसे में जिनके वर्चस्व कायम हैं वह डगमगा सकते हैं|

एक लड़की का जब विवाहयोग्य होती है तो विवाह से पूर्व उसे देखने के लिए लड़के के परिवार के लगभग सभी आते हैं, खासतौर पर पुरुष| सबने उसे देखा होता है, फिर शादी के बाद घूँघट की क्या औपचारिकता रह जाती है? इससे किस प्रकार का सम्मान बड़ों के प्रति दिखाया जाता है? परिवार के बड़े सदस्यों का सम्मान निसंदेह करना ही चाहिए किन्तु सम्मान का यह तरीका उचित नहीं| हम सबसे बड़ा अगर कोई है तो वो ईश्वर है, उसके सामने तो कोई घूँघट नहीं किया जाता| अब अगर कोई यह तर्क दे की मनुष्य का मन बड़ा चंचल होता है ऐसे में स्त्रियों को परदे में रखा जाए तो ही ठीक है वरना कोई पुरुष उनकी तरफ आकर्षित हो सकता है; तब तो पुरुष पर ही लगाम लगाने की ज़रूरत है न की स्त्री पर| कोई वृक्ष अत्यधिक सुंदर है और मीठे मीठे फल देता है, जिसपर सभी की नज़र होती है| ऐसे में उस वृक्ष पर लगाम लगायी जाती है या उसके फल चुराने वालो पर? स्त्री कोई पैसा ,संपत्ति नहीं, या वस्तु नहीं जो तिजोरी में बंद कर दिया जाए| स्त्री तो संपत्ति की देवी माँ लक्ष्मी का रूप है, जो सभी को ऐश्वर्य संपत्ति देती है| लक्ष्मी पर कोई बंदिश हो ही नहीं सकती| विधवा प्रथा के नाम पर, उसके मन को सात्विक रखने हेतु तरह तरह के प्रतिबन्ध लगाये जाते हैं| आज इक्कीसवीं सदी में भी वह सामने से निकल जाए तो अशुभ माना जाता है| जिस स्त्री के बिना कोई भी शुभ कार्य हो ही नहीं सकता उसे ही अशुभ बना दिया गया!!! विधुर के साथ इस प्रकार का बर्ताव क्यूँ नहीं? आज जितना प्रदूषण है, खाद्य सामग्रियां, वातावरण जिस प्रकार अशुद्ध है, ऐसे में ये प्रतिबन्ध कितने सफल होंगे? स्त्री तो सात्विक प्राकृतिक ही होती है उसे सात्विक बनाने की आवश्यकता नहीं| जो भक्तिभाव, सहिष्णुता, प्रेम, समर्पण, ममता, दया स्त्री में है वह किसी और में नहीं| ऐसी प्राकृतिक रूप से गुणवान स्त्री को आप और क्या सात्विक बनायेंगे? अपवाद सभी जगह होते हैं, स्त्रियों में भी हैं किन्तु बेहद कम| विधवा हो या विधुर किसी में कोई अंतर नहीं| वरन नकेल कसनी ही है तो विधुर पर कीजिये क्यूंकि पुरुष को अपने उपर नियंत्रण कम ही होता है| हमारे शास्त्रों के अनुसार स्त्री में पुरुष की तुलना में साहस और धैर्य कई गुना अधिक होता है| खुद ही विचार कीजिये अब किसे प्राथमिकता दी जानी चाहिए|

हमारे समाज में आज भी अधिकतर जगह लड़की पैदा होने पर दुखी हुआ जाता है, किस्मत को कोसा जाता है की अब खर्चा बढ़ गया| लड़की का ध्यान रखना पड़ेगा, शादी में पैसा देना पड़ेगा| लड़का होता तो सहारा बनता, पैसा आता| कैसी दकियानूसी और गिरी हुई सोच है ये! प्रश्न यह उठता है कि शादी में पैसे देने का रिवाज़ पाला ही क्यूँ गया है? दहेज़ किस बात का देना है? लड़के के लिए? उसकी पढ़ाई लिखाई में पैसा खर्च हुआ इसलिए? क्या कन्या के परिवार ने अपनी बेटी की परवरिश और पढ़ाई में पैसा नहीं खर्च किया? पैसा तो दोनों ही जगह खर्च हुआ फिर किस बात का दहेज़? लड़के के माँ बाप अगर यह सोच कर पैसा मांगते हैं की हमने लड़के को इतना पढाया लिखाया और पाला है तो उन्हें एक बार सोच लेना चाहिए की उन्होंने खुद के ही बच्चे को पाला पोसा है, भेड़-बकरी के बच्चे को नहीं की जो बड़ा किया, मोटा ताज़ा किया और मार्किट में बेच दिया, उसकी खिलाई पिलाई का पैसा ले लिया| जहाँ दहेज़ के बलबूते पर रिश्तों का सौदा किया जाता है वहां आपकी बेटी खुश रह पायेगी?

आज जगह-जगह प्राक्रतिक आपदाओं ने देश को घेर रखा है| कहीं सूखा तो कहीं बाढ़, कहीं आगजनी| ये बादल,वर्षा, जल, भूमि, हवा, पर्वत, नदी, खेती, पेड़-पौधे, पशु पक्षी, प्राणी सब कौन हैं? यह “प्रकृति” हैं| प्रकृति अर्थात माँ शक्ति, माँ पार्वती| जिसका स्वरुप स्त्री है| आज प्रकृति और स्त्री दोनों का दोहन जिस प्रकार से हो रहा है वह अत्यंत निंदनीय और वीभत्स है| दोनों की ही उपेक्षा का परिणाम है की प्रकृति अपना रौध्र रूप दिखा रही है| कांवड़ यात्रा शुरू होने वाली है| कांवड़ यात्रा में कितनी महिलाएं आपको दिखी हैं? यक़ीनन बेहद कम| क्यूँ? क्यूंकि इसे भी अब महिला और पुरुष से जोड़ दिया गया है| क्या आप जानते हैं की पहली कांवड़ स्वयं माता पार्वती ने शुरू की थी! स्त्री स्वरूप माँ ने ही इसका आरंभ किया और आज स्त्रियाँ ही इससे दूर हैं| हमारे देश के महाकाव्य “महाभारत” में साफ़ कहा गया है की कलयुग में विनाश और प्रलय का कारण अगर कुछ होगा तो वह है स्त्री का प्रति पल होने वाला शोषण | जब मनुष्य स्त्री के सम्मान को भूल जायेगा, उसे हर तरह से निचोड़ने लगेगा तब प्रकृति अपना प्रतिशोध लेकर ही रहेगी| इन्ही सबका संकेत देने के लिए बाबा बर्फानी तक सिर्फ २६ दिन में ही लुप्त हो गए हैं किन्तु माता पार्वती का आकार अभी भी स्थित है| वह बताना चाह रही है की मैं भी हूँ और मेरे रूप भी हैं इस धरती पर जिसे मानव समाज ने नज़रअंदाज़ कर दिया है|

कई महात्माओं ने तो यह तक कहा की स्त्री को स्वतंत्रता नहीं दी जानी चाहिए, वह पुरुषों से मिलेंगी तो मर्यादा भंग होगी| उन्हें बालकों की तरह संभालना चाहिए| ये कैसा बुद्धिहीन तर्क है? इसके बदले पुरुषों की स्वतंत्रता को बाधित क्यूँ नहीं किया जा सकता? न वह घर से निकलेंगे न किसी स्त्री की मर्यादा भंग होगी| आज तो स्त्री घर में भी सुरक्षित नहीं है फिर स्वतंत्रता को ही निशाना बनाना कहाँ तक उचित है? स्त्री का व्यवहार बालकों की भांति हो सकता है क्यूंकि बचपना जब तक जीवित है मनुष्य के ह्रदय में सौम्यता बनी रहती है| स्त्री यदि बालक होती तो क्या प्रभु श्री राम, माँ जानकी, श्री कृष्णा, राजा विक्रमादित्य, राणा उदय सिंह, महाराणा प्रताप, वीर शिवाजी आदि का नाम आज हम जानते होते? इनके व्यक्तित्व को निखारने में जिसका योगदान सर्वोतम रहा वह इनकी माताएं ही थी| सोचिये ज़रा, यदि वह बालक होती तो क्या बालकों को पाल पाती? तर्क दिया जाता है चाणक्य जी का की उन्होंने महिलाओं को मूर्ख और अविश्वसनीय कहा है| कभी इतिहास उठा के देखिये, मौर्य वंश के समय जिन्होंने सबसे बड़ी राजनीति करी वह महिलाएं ही थी| चाणक्य स्वयं महिलाओं का सम्मान करते थे, भला वह कैसे ऐसे शब्दों का इस्तेमाल कर सकते हैं? यह तो कई वर्षों से कहा जाता रहा है की हमारे देश के शास्त्रों के साथ छेड़छाड़ हुई है, ऐसे में खुद का विवेक प्रयोग में लाने की आवश्यकता है| ऐसे न जाने कितने ही उदहारण हैं जिन्हें तोड़ मरोड़ के पेश करके हर प्रकार से स्त्री को नीचा दिखाने का प्रयास किया गया है| सबसे पवित्र ग्रन्थ श्री रामचरितमानस जी के दोहों का ही इस्तेमाल कर दिया जाता है बिना विचारे| ढोल गंवार, शुद्र, पशु नारी, सकल तड़ना के अधिकारी|| मूर्खों के सन्दर्भ में इसका तात्पर्य देखा जाये तो होगा:- ढोल, गंवार, शूद्र, पशु और नारी, यह सब डंडे के अधिकारी हैं| अपनी बुद्धि का प्रयोग कर ज़रा गहन विचार कीजिये जो रामचरितमानस पूर्ण रूप से प्रभु श्री राम और माता सीता जैसे परम पवित्र परमात्मा पर आधारित है वह किसी स्त्री के विषय में ऐसा कह सकते है क्या? तुलसीदास जी तो खुद स्त्री से ही प्रेरित हुए थे ईश्वर के नाम का जाप करने हेतु| इसका अर्थ समझिये:- ढोल अर्थात कान, गंवार अर्थात बुद्धि, शूद्र अर्थात स्पर्श या त्वचा, पशु अर्थात नाक, नारी अर्थात रसना(जिह्वा) क्यूंकि रसना एक स्त्रीवाचक शब्द है, इन पांचो पर ही नियंत्रण रखने की आवश्यकता है| कान से गलत सुनेंगे तो विचार वैसे ही बनेंगे, बुद्दी को गलत कार्यों में प्रयोग करेंगे तो अपना ही व्यक्तित्व नष्ट होगा, स्पर्श अगर आग पर करेंगे तो हमें ही जलाएगी, नाक से तरह तरह की खुशबु सूंगने से उसी के आदि हो जायेंगे, इसका प्रयोग प्रभु चरणों के पुष्प सूंगने हेतु किया जाए तो अति उत्तम है, व् रसना यानी जीभ बड़ी चटोरी होती है| ज्यादा कुछ गड़बड़ खाया तो स्वाथ्य पर बुरा प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है| स्वस्थ तन नहीं तो स्वस्थ मन कैसे और स्वस्थ मन नहीं तो स्वस्थ विचार कैसे, और जब विचार ही स्वस्थ नहीं होंगे तो स्त्री सम्मान कैसे होगा? यहाँ पर बुद्धि हीन लोग “तड़ना” को “ताड़ना” कहते हैं| तड़ना का अर्थ है देख-रेख जबकि “ताड़ना” का अर्थ है खींच के रखना|

 

आज यदि लड़कियां, स्त्रियाँ अपनी स्वतंत्रता की बात कर रही हैं तो उनकी इस बात का बहुत ही गहराई से विश्लेषण करना चाहिए| आपको जगह जगह सुनते दिख रहा होगा की लड़कियों ने कहा हमें भी रात में बाहर रहने, घूमने फिरने, मद्यपान करने का अधिकार देना चाहिए, लड़कों का ही हक क्यूँ इस पर! यहाँ इन शब्दों में छिपे उस मर्म को समझना चाहिए जिसे आज हर वर्ग नज़रंदाज़ कर रहा है| ज्वालामुखी के मुख को अगर बंद कर दिया जाए तो वह ऐसा विस्फोट करेगा जिससे सब तबाह हो जाता है| नदी के प्रवाह को रोक दिया जाए तो बाढ़ आ जाती है| अग्नि को दबाया जाए तो वह उसे दबाने वाले को ही जला देती है| वायु का वेग रोका जाए तो जो सामने होता है वही नष्ट हो जाता है| आज महिलाओं की यह मांग इसी प्रकार की ज़बरदस्ती का परिणाम है| शराब पीना, रात को बाहर जाना आदि क्या लड़कों को शोभा देते हैं? अगर वो गलती से एक भी बार ऐसा कर लें तो हम एक बार के लिए उन्हें क्षमा क्यूँ कर देते हैं? ज़रा ऐसी ही परिस्थिति लड़की के साथ सोचिये| तब क्या करेंगे? लड़कियों के लिए माहौल असुरक्षित क्या हमने ही अपने परिवार में ही शुरू से भेदभाव कर के पैदा नहीं किया? आज अपराध करने वाले लड़कों, पुरुषों का यदि यह हौंसला है और उन्हें अपने पर नियंत्रण नहीं है तो क्या इसके लिए कहीं न कहीं परिवार ज़िम्मेदार नहीं? जिम्मेदारी तो दोनों ही बच्चों की बहुत बड़ी है फिर चाहे लड़की हो या लड़का| दोनों पर ही एक उम्र तक समान निगरानी, अंकुश, नकेल कसना आवश्यक है| लड़कों की भी इज्जत होती है जिसे संभालना ज़रूरी है| अगर देखा जाए तो लड़के ज्यादा जल्दी बिगड़ते है| दिल्ली में जितने वीभत्स बलात्कार आज हो रहे हैं उसमें अपराधी की पारिवारिक स्थिति देखेंगे तो पाएंगे की अधिकतर नाबालिग हैं, उनकी खुद की बहनें आदि हैं| बहनों ने किसी का रेप नहीं किया पर भाई ने कर दिया, क्यूँ? शिक्षा और अंकुश की कमी के कारण| लडकियां शराब पीना, रात में घूमना नहीं चाहती, किन्तु इतने वर्षों से उनका इतना शोषण हुआ है की उनकी आत्मा तक कराह उठी है और वह विस्फोट कर रही है जो सही रस्ते भी जा सकता है गलत भी | ज़रूरत है तो उनकी पीड़ा को समझने की, स्वतंत्रता को लेकर उनकी असली मांग को समझने की|

कई लोग महिलाओं की स्थिति सुधारने हेतु आगे आये किन्तु उन्हें ही पीछे धकेल दिया गया| समाज पर आज सबसे बड़ा कलंक वैश्यावृति भी है जिसके माध्यम से महिलाओं को और अधिक असुरक्षित बनाया गया है| इसके पीछे तर्क दिया जाता है की यदि वैश्यावृत्ति न हो तो पुरुषों पर थोडा भी लगाम नहीं लग पायेगा, यक़ीनन हमारे समाज में हर वो गंदे से गन्दा प्रयास किया गया है जिससे पुरुषवादी सोच को बढ़ावा मिले और महिलाएं इतना गिर जाएँ की उपर उठ न सकें| किन्तु यह याद रखना चाहिए की सूरज कभी डूबता नहीं| यह तो उसे देखने का कोण निश्चय करता है की अभी दिन है या रात| स्त्री को जितना कमज़ोर समझा जा रहा है वह उतनी तो क्या उससे कम भी कमजोर नहीं है| ज़रूरत है तो उसे जगाने की जैसे रामायण में जामवंत जी ने श्री हनुमान को सागर पार करने हेतु उनकी शक्ति का स्मरण कराया था| देवी दुर्गा के श्लोक से ही यह प्रमाणित हो जाता है कि स्त्री ही प्राणी मात्र में निहित शक्ति है, उसकी जिह्वा है, स्मरण शक्ति है, समझ ,बुद्धि, धैर्य, बल है; भूख, प्यास, प्रेम, निद्रा, आत्मज्ञान, माया, छाया, पंचतत्व, क्षमा है| वह प्राणी की जाति है; लज्जा; शांति, श्रद्धा, कान्ति, लक्ष्मी, वृत्ति, संतुष्टि, माता, भ्रान्ति, इन्द्रियां, आदि सब है| यदि यह सब प्राणिमात्र की देह से निकल जाए तो भस्म भी न बचे| जिसके बिना हम कुछ नहीं है उसी स्त्री पर इतने अत्याचार???

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।

यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ॥

“जहाँ महिलाओं का सम्मान होता है वहां देवता अत्यधिक प्रसन्न होते हैं और वास करते हैं| जहाँ उनका अपमान होता है वहां सभी कार्य निष्फल हो जाते हैं| “

स्त्रियों के उत्थान हेतु सबसे पहले स्त्रिओं को ही पहल करनी होगी क्यूंकि आज स्त्रियों की सबसे बड़ी दुश्मन स्त्री स्वयं है| वह स्वयं की शक्ति न पहचान कर दिखावटी आडम्बरों से खुद को बांध रही है, समाज की उस ख़ुशी के लिए जो समाज के हित में नहीं| स्त्रियों को ही एकजुट होकर दूसरी स्त्री की रक्षा करनी होगी| स्त्री और पुरुष में जब परमात्मा ने कोई भेद नहीं किया, दोनों को बराबर मात्रा में वायु, जल, प्रकाश, धूप, बरसात, ठण्ड सब मिलती है तो आप और हम कौन होते हैं भेद करने वाले| मुझे अत्यंत ख़ुशी है की आज की युवा पीढ़ी इस ओर कुछ जागरूक हुई है| महिलाओं को सशक्त करने हेतु समाज, और व्यवस्था को एकजुट होना होगा| सिर्फ व्यवस्था कुछ नहीं कर सकती क्यूंकि मानसिकता तो समाज को ही अपनी बदलनी है| व्यवस्था परिवर्तन की भी अत्यंत आवश्यकता है| शासक सही न हो तो शासन सही कैसे हो| शासन ही सही नहीं होगा तो प्रजा की रक्षा कौन करेगा| सरकारें आती हैं जाती हैं किन्तु स्त्रियों की परिस्थति की ओर किसी का ध्यान नहीं| मुझे ख़ुशी है इस बात की कि अब एक ऐसी सरकार का पदार्पण हुआ है जिसने अपने सीमित क्षेत्र को ही माहिलाओ की सुरक्षा हेतु तैयार करना आरंभ कर दिया है और महिलाओं की आज़ादी हेतु एक ऐसी महिला का चयन उच्च पद पर किया है जिसने स्वयं अथाह संघर्ष किया है महिलाओं को सशक्त और एकजुट करने हेतु| आपने सही सोचा! मैं दिल्ली महिला आयोग की सबसे कम उम्र की नवनिर्वाचित अध्यक्ष की बात कर रही हूँ| वह मेरी नज़र में पहली ऐसी महिला हैं जिन्होंने दिल्ली के सबसे घिनौने माने जाने वाले जी बी रोड तक का मुआयना किया और अभी भी कर रही है| लगातार ऐसी महिलाओं, पीड़ितों से जानकारियां प्राप्त कर रही है, उनकी परिस्थिति का ज्ञान अर्जित कर रही हैं जिन्हें समाज ने धुत्कार दिया है| दिल्ली को रेप फ्री राजधानी बनाना, महिलाओं की सुरक्षा, वैश्यावृति रोकना, विधवा, तलाकशुदा आदि समाज के द्वारा प्रताड़ित महिलाओं को जागरूक और सशक्त करने हेतु इस महिला का आगमन हुआ है| यही नहीं, उस हर परिश्रम को इन्होने अपनाया जिससे एक महिला का आत्मसम्मान बच सके| जो उत्साह, लगन, कुछ नया असरकारक करने की इच्छा, और परिश्रम यह अपने में समाए हुए हैं उसे देख कर यह विश्वास होता है की प्रकृति ने अपने ही स्वरुप को स्त्रियों के उत्थान व् जागरूकता हेतु तैयार किया है| अब अगर ज़रूरत है तो प्रकृति की इस देन का साथ देने और एकजुट होने की| महिलाओं तक पहुँच बनाने में निसंदेह अत्यधिक रुकावटें हैं जिन्हें लांघना बहुत बड़ी चुनौती होगी| उम्मीद करती हूँ की मेरे मन में स्त्रियों की आज की स्थिति को देख कर जो पीड़ा और चिंता है वह कम होगी और हमें इस नई अध्यक्षा पर गर्व होगा| जय हिन्द!

प्रेषक

रीटा चौहान

(यह प्रेषक के व्यक्तिगत विचार हैं|)

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