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तरन्नुम की दर्दनाक दास्ताँ, आप भी जानिए|

June 30, 2015 12:03 PM

गरीबी संघर्षशील जीवन की जननी होती है, कम उम्र में ही ढेरों जिम्मेदारियां के निर्वहन का दायित्व सौंप देती है। तरन्नुम का जीवन भी आसान नहीं था। रहने के लिए एक झुग्गी थी और दो वक़्त की रोटी जुटाने के लिए वो छोटे-मोटे काम किया करती थी। माता-पिता की गैर मौजूदगी में, अपने हाथों से पहली बार खाना बनाते हुए उसका शरीर झुलस गया था, सांस-ससुर ताने मारते थे और पति मार-पीट करता था। सर पे जिम्मेदारियों का बोझ और संसाधनों के अभाव ने फिर किसी काम की तलाश में लगा दिया।

वो रात बहुत शांतिपूर्ण थी, तरन्नुम ने अपनी दोस्त से मिलने का निर्णय लिया, तरन्नुम बहुत दिनों से अपनी दोस्त के वहां जाने की सोच रही थी, जो जामा मस्जिद के पास बने महिला आश्रय गृह में रहती थी। इन दिनों वो उस आश्रय गृह में शायद ही कभी जाती हो जहाँ से उसे युवा अवस्था में गुज़र–बसर करने के लिए सहायता मिलती रही। धैर्य और धन, दोनों की ही कमी थी तरन्नुम के जीवन में और इस जगह से उसे दोनों से कहीं ज्यादा मिलने की उम्मीद थी। उसे कुछ समय यहाँ बिताना होगा और वो उसे भोजन और रहने की सुविधा देंगे, इससे अधिक उसे चाहिए भी क्या था। गहरी सांस भरते हुए वो मस्जिद की ओर चलने लगी, उसके चेहरे पर उदासी भरी मुस्कान थी, स्मृतियों में युवा अवस्था के उदासीन पल ताज़ा हो उठे, खुद को और भी युवा महसूस करने लगी, काश की वो रोज़ ऐसा ही महसूस कर पाती।

उसने देखा... चारों तरफ भीषण आग लगी हुई थी!!

वो भागकर वहां पहुंची जहाँ भीड़ एकत्रित हुई थी। अपनी नज़रों के सामने वो अपनी झुग्गी को तेज़ी से जलते हुए मात्र देख ही सकती थी, तभी उसे पता चला कि उसका बच्चा झुग्गी के अन्दर फंस गया है, उस भीषण अग्नि में ये पहचान पाना भी मुश्किल हो चुका था कि उसकी झुग्गी कौन सी थी। उसका 5 साल का बेटा सरताज उस आग में जलकर अकाल मृत्यु को प्राप्त हो गया।

तरन्नुम ने जनता संवाद में Public Grievance Monitoring System (PGMS) की प्रमुख स्वाति मालीवाल को बताया कि दो साल पहले सरकार ने उसे मुआवजा देने का वादा किया था। उसने कई बार तत्कालीन दिल्ली सरकार को पत्र भी लिखे, पिछले दो वर्षों से वो सरकार से मुआवजा देने की गुहार कर रही है। “मेरी दो छोटी-छोटी बेटियां हैं, मेरे पति जेल में हैं और मेरे पिता के पास पैसे नहीं हैं। मैं अपने बच्चों के भविष्य को बर्बाद नहीं होने देना चाहती!” रोते-रोते उसने कहा... “जो बीत गया उसको सरकार भूलने नहीं दे रही, मुझे हर दिन उस रात की पीड़ा को जीना पड़ता है, पिछले दो सालों से में एक विभाग से दूसरे विभाग के चक्कर काट रही हूँ.. अपने जीवन की नयी शुरुआत करने के लिए मुझे पैसों की जरुरत है, जीवन भर की निराशा उसकी आँखों से आंसू बनकर बहने लगी, ”प्लीज, कुछ कीजिए”, उसकी विनती में दर्द और निराशा के भाव ने हमें झकझोर के रख दिया।

अपने मामले की प्रगति के बारे में जानने के लिए तरन्नुम प्रत्येक सप्ताह मुख्यमंत्री के जनता संवाद में आने लगी। सप्ताह दर सप्ताह उसके चेहरे पर विश्वास का भाव बढ़ता गया और उसके चेहरे पर मुस्कान उभरने लगी। मामले की कार्यवाही PGMS की निगरानी में होने लगी। मामला अब राजस्व विभाग से जिला कलेक्टर के पास आया। अंततः, दो हफ्ते बाद, SDM ऑफिस में दो साक्षियों के सम्मुख; कागज़ी कार्यवाही के बाद तरन्नुम को मुआवजा दिया गया।
वो आश्चर्यचकित थी कि अनेक पत्र लिखने के बाद भी जो काम पिछली सरकार ने 2 साल में नहीं किया वही काम एक बार शिकायत करने पर केजरीवाल सरकार ने 1 महीने में कर दिया।

मुआवजा मिलने के बाद तरन्नुम वापस जनता संवाद में अरविन्द केजरीवाल से मिलने पहुँची, उसके शब्द थे "जिस दिन आग लगी थी उस दिन आपके कार्यकर्ताओं ने रहने और खाने की व्यवस्था की थी, मुझे पूरा यकीन था कि आप इस काम को बहुत जल्द कर देंगे।"

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