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सार्वजनिक-निजी भागीदारी: रेलवे स्टेशनों के विकास पर भारी

May 04, 2019 02:44 PM

यहां भी अदूरदर्शिता और गड़बड़ झाला

वादा—फ़रामोशी यानि प्रधानमंत्री मोदी की कथनी और करनी के अंतर को सप्रमाण बयां करता एक ऐसा पुख्ता दस्तावेज़  जिसके एक—एक शब्द को प्रमाणित करने के लिए कड़ी मेहनत की गई, सैकड़ों आरटीआई के माध्यम से भारत सरकार के तमाम मंत्रालय खंगाले गए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषणों में किए जाने वाले दावों को गौर से सुना गया और धरातल पर कुछ भी नज़र न आने पर संबंधित मंत्रालयों से सूचना अधिकार के जरिए सीधे प्रश्न पूछे गए। आरटीआई के इन दस्तावेजों को पुस्तक आकार दिया है संजॉय बासु, नीरज कुमार एवं शशि शेखर ने.

'आप की क्रांति' संपादकीय मंडल ने इस पुस्तक को मनोयोग से पढ़ने के उपरांत इसकी उपयोगिता और सारगर्भिता के  मद्देनजर इसे क्रमश: प्रकाशित करने का निर्णय लिया है, आशा है हमारे सुधी पाठकों को हमारा यह प्रयास पसंद आएगा। इसी कड़ी में आज प्रस्तुत है वादा— फरामोशी श्रृंखला का दूसरा भाग।

25 जुलाई 2018 को रेल राज्य मंत्री ने संसद में एक लिखित जवाब में बताया था कि स्टेशनों का विकास बहुत ही जटिल किस्म का काम होता है, जिसमें तकनीकी- आर्थिक अध्ययन और स्थानीय निकाय से मिलने वाले वैधानिक अनुमति की आवश्यकता होती है. इसलिए किसी भी प्रोजेक्ट के लिए समय सीमा निर्धारित करना कठिन हो जाता है.

'आप की क्रांति' संपादकीय मंडल ने इस पुस्तक को मनोयोग से पढ़ने के उपरांत इसकी उपयोगिता और सारगर्भिता के  मद्देनजर इसे क्रमश: प्रकाशित करने का निर्णय लिया है, आशा है हमारे सुधी पाठकों को हमारा यह प्रयास पसंद आएगा। इसी कड़ी में आज प्रस्तुत है वादा— फरामोशी श्रृंखला का दूसरा भाग।

इसी लिखित जवाब में उन्होंने बताया कि 13 ऐसे स्टेशनों को चुना गया है जिनका पुनर्विकास पीपीपी मॉडल (सार्वजनिक-निजी भागीदारी) से किया जाएगा. इन स्टेशनों में चारबाग, एरनाकुलम, गोमती नगर, हबीबगंज, दिल्ली सराय रोहिल्ला, जम्मू तवी, कोटा, कोझीकोड, मडगांव, नेल्लोर, पुडुचेरी, सूरत, तिरुपति स्टेशनों के नाम शामिल है. इस काम के लिए इन स्टेशनों की नीलामी ओपन बिड के जरिए निजी कंपनियों के हाथों हो चुकी है. 

18 जनवरी 2017 को टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, 23 स्टेशनों के पुनर्विकास का काम के लिए निजी कंपनियों को दिया गया है, जिनमे हावड़ा, मुम्बई सेंट्रल, चेन्नई सेंट्रल भी शामिल है. वैसे रेल राज्य मंत्री ने अपने जवाब में इन तीनो स्टेशनों का जिक्र नही किया था और स्टेशनों की संख्या 23 से घटा कर बस 13 रह गई.

18 जून 2017 को मीडिया में खबर आई कि 28 जून 2017 को इन 23 स्टेशनों की ऑनलाइन नीलामी की जाएगी और 30 जून को रेलवे चुनी गई कंपनियों के नामों की घोषणा करेगी. इसी खबर में बताया गया कि इलाहाबाद स्टेशन के लिए 150 करोड़ रुपए और कानपुर सेंट्रल के लिए 200 करोड़ रुपये रिजर्व प्राइस तय की गई है.

जब हमने आरटीआई के जरिए ये पूछा कि पीपीपी मॉडल के तहत कितने स्टेशनों को किन प्राइवेट पार्टियों को सौंपा गया है ? तो हमें चौंकाने वाले जवाब मिले. जवाब में बताया गया कि कोई भी स्टेशन अभी तक किसी भी प्राइवेट पार्टी को नहीं दिया गया है. आईआरएसडीसी ( इंडियन रेलवे स्टेशन डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन) को एक तय अवधि तक लीज के जरिए स्टेशनों के पुनर्विकास का अधिकार दे दिया गया.

यहां कहानी में एक नया मोड़ आता है. इंडियन रेलवे स्टेशन डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन का गठन 2012 में किया गया था, जो भारतीय रेलवे की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी है. बाद में रेलवे की एक और सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम इरकॉन की एंट्री संयुक्त उद्यम बनाने के लिए हुई. इसने अभी तक क्या कार्य किया है, उसकी झलक वेबसाइट पर ही दिख जाती है. 7 सालों के दौरान, 185.96 करोड़ रुपये के 24 कॉन्ट्रैक्ट जारी किए. 24 में से बस 2 कॉन्ट्रैक्ट निर्माण कार्य से जुडे थे और बाकी के सारे कांट्रैक्ट कंसल्टेंट इंगेजमेंट से जुडे हुए थे. उन 2 में से बस एक कॉन्ट्रैक्ट हबीबगंज रेलवे स्टेशन से संबंधित था. हबीबगंज के पुनर्विकास का जिम्मा बंसल कंस्ट्रक्शन वर्क प्राइवेट लिमिटेड को मिला था. लेकिन कॉन्ट्रैक्ट की धन राशि कितनी थी, ये नही बताई गयी थी.

दूसरी ओर, जिस दिन हबीबगंज रेलवे स्टेशन के लिए आर्किटेट फाइनल किया गया, उसी दिन उसी आर्किटेक्ट को चंडीगढ़ रेलवे स्टेशन को डिजाइन करने के लिए अनुबन्ध दे दिया गया. सूरत रेलवे स्टेशन के मामले में कम से कम चार अलग-अलग सलाहकार 6 जनवरी 2015 से 1 जून 2018 तक काम में लगे हुए थे और इस पर करोड़ों खर्च किए गए थे लेकिन अभी तक काम शुरू नहीं हो सका.

1 नवंबर 2018 को, रेलवे बोर्ड ने एक पत्र जारी किया था, जिसमें उल्लेख किया गया था कि उसने आईआरएसडीसी को भारतीय रेलवे के सभी स्टेशनों (पहले के स्टेशनों को छोड कर) को सौंपने का निर्णय लिया है. 27 स्टेशनों की सूची में से 10 को कंसोर्टियम ऑफ रेलवे लैंड डेवलपमेंट अथॉरिटी एंड एनबीसीसी इंडिया लिमिटेड को दे दिया गया. भुवनेश्वर रेलवे स्टेशन को विकसित करने का काम संयुक्त रूप से राज्य सरकार और इस्ट कोस्ट रेलवे को दिया गया वहीं शेष 15 स्टेशनों को विकसित करने की जिम्मेदारी आईआरएसडीसी को दे दी गई. इस प्रकार, हम कह सकते हैं कि पिछले 2 वर्षों के दौरान एक भी पीपीपी आकार नहीं ले पाया. यहां तक कि 2013-14 में आईआरएसडीसी द्वारा लिए गए प्रोजेक्ट, सलाहकारों को काम पर रखने के लिए खर्च किए करोड़ों रुपये के बाद भी कोई काम धरातल पर उतरता नहीं दिख रहा है. 

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