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कालाधन सफेद : इलेक्ट्रॉल ट्रस्टों का धंधा, मंदी में भी चंगा

January 31, 2018 05:43 PM

पैसा कहां से आया, किसे दिया, चुनाव आयोग को सही जानकारी नहीं

मौजूदा वित्तीय वर्ष में सबसे अधिक 290 करोड़ दान मिला भाजपा को

अमरजीत सिंह

यूंं तो चुनाव आयोग किसी भी चुनाव से पहले सही सलामत और पारदर्शी ढंग से चुनाव संपन्न करवाने का वादा करता आया है लेकिन असलियत ये है कि ऐसा कभी हुआ ही नहीं। कुछ बड़े कारोबारियों ने जो इलेक्टोरल ट्रस्ट बना रखे हैं वो चुनावों के दौरान कितना काला धन, चुनाव लडऩे वाली पार्टियों को चंदे के रुप में देते हैं, इसका ज्य़ादातर खुलासा वो नहीं करते। जो आधी अधूरी जानकारी वो चुनाव आयोग को मुहैया करवाते हैं उसपर यकीन करना भी गल्त होगा। बार बार अपने पते बदलने वाले ये न्यास आज तक किसी वैधानिक या न्यायिक कार्यवाई से बचे ही रहे हैं। इनके खिलाफ कोई कार्यवाई इसलिए भी नहीं होती क्योंकि ये थोड़ा थोड़ा धन सभी राजनीतिक दलों में बांटते रहते हैं जो आड़े वक्त इनके काम आते हैं। अगर मात्र पिछले साल का ही लेखाजोखा देखें तो भी करोड़ों रुपया राजनीतिक पार्टियों को ये न्यास सफेद धन के रुप में दे चुके हैं जो इनके पास कहां से आया, ज्य़ादातर इसका पता नहीं।

वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग के तहत काम करने वाले सेंंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सइज  के पास इलेक्टोरल ट्रस्ट अपना पंजीकरण करवाते हैं। सीटीबीटी को ये अपनी आमदनी और खर्च की सारी जानकारी देते हैं। यही जानकारी चुनाव आयोग को निर्धारित समय पर दी जानी होती है। वित्तीय वर्ष 2016-2017 की सूचना के मुताबिक सीटीबीटी के साथ पंजीकृत 21 में से जिन 14 इलेक्टोरल ट्रस्टों ने अपने वित्तीय लेखे की जानकारी चुनाव आयोग को दी है उनमें से 6 ने माना है कि उन्होंने इस समय के दौरान दान प्राप्त किया है। इनमें से जन शक्ति  इलेक्टोरल ट्रस्ट सितंबर 2017 में ही पंजीकृत हुआ है। एडीआर (एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स) ने वर्ष 2013 के बाद वज़ूद में आए ऐसे 6 इलेक्टोरल ट्रस्टों द्वारा वित्तीय वर्ष 2016-2017 के दौरान राजनीतिक दलों को दिए गए दान का लेखा जोखा खंगाला है।

बता दें कि वित्तीय वर्ष 2013-14 से 2016-17 के दौरान 9 पंजीकृत इलेक्ट्रोल ट्रस्टों ने कुल मिलाकर 637.54 करोड़ रुपया राजनीतिक दलों को दान दिया। सिर्फ एक बार ही नहीं दो ट्रस्टों ने तो दो दो बार बड़े बड़े फंड दान किए। छह इलेक्ट्राल ट्रस्टों ने वित्तीय वर्ष 2013-14 में 85.37 करोड़ रुपया, 2014-15 में 177.40 करोड़, 2015-16 में 49.50 करोड़ और 2016-17 में 325.27 करोड़ रुपया राजनीती करने वालों में बांटा। ये कोई छोटी रकम नहीं है। इन न्यासों को ये पैसा कहां से मिला, ये भी एक गोरखधंधा है। ज़ाहिर है ये काला धन था जिसे सफेद करने के लिए न्यास का सहारा लिया गया।

नियम ये है कि किसी भी इलेक्ट्राल ट्रस्ट के पंजीकरण का नवीनीकरण तीन वित्तीय वर्षों के दौरान हो जाना चाहिए। लेकिन सत्या इलेक्टोरल ट्रस्ट जो कि 2013 में सीटीबीटी के पास पंजीकृत हुआ था का नवीनीकरण 2016 में करवाने के लिए आवेदन आया। खास बात ये कि 2013 में मात्र सत्या इलेक्ट्राल ट्रस्ट ही था जिसे सीटीबीटी से पंजीकृत होने के लिए योग्य पाया गया। 21 से 14 ट्रस्ट वो हैं जोकि लगातार अपने जमा खर्च का हिसाब चुनाव आयोग को देते रहे हैं। सत्या और जनहित पिछले चार साल से अपना हिसाब जगजाहिर कर रहे हैं। लेकिन कल्याण इलेक्टोरल ट्रस्ट एकमात्र ट्रस्ट है जिसने आयोग को कभी बताया ही नहीं कि सके पास पैसा कितना आया या कितना किसको दिया। इस पर भी सके खिलाफ कोई कार्यवाही अमल में नहीं लाई गई।

यहां ये भी ध्यान देने योग्य है कि वित्त वर्ष 2016-17 में जिन छह ट्रस्टों ने करीब 325.45 करोड़ का दान प्राप्त किया उसमें से 99 फीसदी धन उन्होंने आगे बांट दिया है। इसमें भी सबसे अधिक धन भारतीय जनता पार्टी के हिस्से आया है। प्रूडेंट इलेक्टोरल ट्रस्ट ने भाजपा को 252 करोड़ दिए तो जनता निर्वाचक इलेक्ट्राल ट्रस्ट ने अपना पूरा पैसा यानि 25 करोड़ रुपया भाजपा को दे डाला। भाजपा को इस वर्ष 290 करोड़ रुपए से अधिक का दान मिल चुका है। इन न्यासों की एक खास बात ये है कि ये समय समय पर अपना पता बदलते रहते हैं और इसकी विधिवत सूचना भी भारतीय चुनाव आयोग या सीटीबीटी को नहीं दी जाती। वर्ष 2016-17 में सत्या इलेक्टोरल ट्रस्ट ने अपना नाम बदलकर प्रूडेंट इलेक्टोरल ट्रस्ट कर लिया। इस न्यास ने अपना पता भी बदल लिया। पहले ये वसंत कुंज में था अब ये बहादुर शाह ज़फर मार्ग पर चला गया है। इस बात की जानकारी भारतीय चुनाव आयोग की वेबसाईट पर अभी तक नहीं डाली गई है।

अब दान आता कहां से है, यदि इस पर नज़र मारी जाए तो सबसे अधिक धन दिया डीएलएफ लिमिटिड ने। यूपीएल, जेएसडब्लू एनर्जी और डीएलएफ ने 25-25 करोड़ दान दिए। इनके अतिरिक्त सुरेश कोटक और अनलजीत सिंह दोनों ने व्यक्तिगत तौर पर दान दिया। इसके साथ साथ छोटा मोटा दान इसी वित्तीय वर्ष में एआईटीसी, कांग्रेस और आईएनसी को भी मिला है। दान लेने वालों में शिरोमणि अकाली दल, समाजवादी पार्टी भी पीछे नहीं, भले ही उन्हें कम धन मिला है। कहा जा सकता है कि हमाम में सभी नंगे हैं।

कौन जाने किस घड़ी वक्त का बदले मिजाज़। राजनीतिक दलों को दान देने वाले न्यास या इलेक्टोरल ट्रस्ट इस बात को हमेशा ध्यान में रखते हैं इसीलिए वे सिर्फ किसी दल विशेष को ही नहीं बल्कि कई पार्टियों को चुनाव के दौरान भारी धनराशि देते हैं ताकि बाद में सरकार किसी की भी बने तो भी वो अपना काम निकलवा सकें। एकाध इलेक्टोरल ट्रस्ट ही ऐसा है जो सीधे रूप में किसी विशेष पार्टी से जुड़ा हुआ है। जैसा कि एडीआर बहुत लंबे समय से मांग करता आया है, होना तो ये चाहिए कि इलेक्टोरल ट्रस्टों को मिलने वाले धन की प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए ताकि किसी तरह के घुड़ व्यापार की गुंजाइश ही न रहे। हो ये रहा है कि स्वयं चुनाव आयोग को ही नहीं पता होता कि चुनाव में कौन कितना पैसा खर्च कर रहा है चुनाव जीतने के लिए। ये जानकारी बहुत देर बाद सामने आती है और वो भी आधी अधूरी। तब तक नई सरकार का गठन हो चुका होता है और सत्ता में होने के कारण सत्ताधारी दल अनियमितताओं को छुपाने में कामयाब हो जाते हैं।

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