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सिर्फ नाम बदल देने से कुछ नहीं बदलता साहिब, ये अटल सच्चाई है

January 28, 2018 09:19 AM

भाजपा ने पुरानी योजनाओं का आरएसएस नेताओं के नाम पर किया नामकरण

तो दिल्ली का राम लीला मैदान अब धरना ग्राऊंड हो जाना चाहिए-केजरीवाल

बुत लगाने से यदि लाभ होता तो आज मायावती कहीं दिख रही होतीं

दिल्ली: जबसे भाजपा सरकार वज़ूद में आई है तब से अब तक न जाने कितने स्मारकों और प्रसिद्ध स्थलों सहित योजनाओं और परियोजनाओं के नाम बदले जा चुके हैं। न जाने भाजपा को पुराने नामों विशेषकर पुराने नेताओं के नामों से इतनी चिढ़ क्यों है। यहां तक कि सरदार पटेल को भी कांग्रेसी न मानकर उसे भाजपाई और हिदुवादी रंगत देने से नहीं हिचकिचा रही भारतीय जनता पार्टी की सरकार। कुछ योजनाओं के नामों में तो मामूली परिवर्तन सिर्फ इसलिए किया गया ताकि ये लगे कि योजना मोदी काल में आरंभ की गई है। प्रधानमंत्री मोदी की ये मानसिकता हमेशा चर्चा में बनी रहती है। अपने कार्यकाल में वो और किन किन स्मारकों का नाम बदलेंगे कहा नहीं जा सकता लेकिन वो शायद भूल रहे हैं कि सत्ता तो आनी जानी है, जब कोई और पार्टी सत्ता में आएगी तो क्या मोदी की इस कार्यवाई पर पानी नहीं फेर देगी?

कितनी हास्यास्पद बात है कि दिल्ली के लोधी रोड का नाम मोदी रोड कर देने का प्रस्ताव रखने के पीछे कारण ये बताया जा रहा है कि यहां मुगलों के नाम पर पहले ही बहुत से मार्ग हैं। लेकिन यदि ये कहा जाए कि मु$गलों ने भारत पर करीब दो सौ साल शासन किया, वो यहां की संस्कृति में घुल मिल गए थे, हिंदुओं से उनका रोटी बेटी का रिश्ता था, बहुत स्थानों विशेषकर वास्तुकला पर उनकी छाप आज भी देखी जा सकती है जिसके चलते स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी देश के कई हिस्सों में मुगल शासकों के नाम पर स्थलों के नाम कायम हैं तो ये गलत नहीं है। मगर नरेंद्र मोदी ने तो अभी पांच साल भी शासन नहीं किया और ऐसे में ऐसा क्या

कर दिया कि प्राचीन और विरासती स्थलों का नामकरण उनके नाम पर कर दिया जाए। 

भाजपा के वरिष्ठ नेता सुब्रामनियन स्वामी ने लोधी रोड के पुन: नामकरण पर जब कहा कि मोदी प्रधानमंत्री बनने से पहले चाय बेचा करते थे, जिस व्यक्ति ने जनता की सेवा गर्म चाय से की हो यदि किसी मार्ग का नामकरण उसके नाम पर हो तो इसमें बुराई क्या है?

भाजपा के वरिष्ठ नेता सुब्रामनियन स्वामी ने लोधी रोड के पुन: नामकरण पर जब कहा कि मोदी प्रधानमंत्री बनने से पहले चाय बेचा करते थे, जिस व्यक्ति ने जनता की सेवा गर्म चाय से की हो यदि किसी मार्ग का नामकरण उसके नाम पर हो तो इसमें बुराई क्या है? तो ये है भाजपा का तर्क। इस पर सोनिया गांधी ये कहकर अपनी टिप्पणी दर्ज कर चुकी हैं कि भाजपा तो केवल नाम बदलने में विश्वास रखती हैं जबकि पिछले सात दशकों से कांग्रेस के तत्वाधान में गांधी-नेहरू खानदान ने न केवल भारत के विकास में पूर्ण सहयोग दिया बल्कि देश की हर अवस्था में एक स्तंभ की तरह अडिग खड़े भी रहे।

भाजपा की इस कार्यवाही पर आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि यदि ऐसा ही है तो फिर दिल्ली के राम लीला मैदान को आप धरना ग्राऊंड का नाम दिया जाना चाहिए। इतना ही नहीं केजरीवाल ने ये मांग भी की थी कि क्यों न आम आदमी पार्टी सदस्यों को सभी पीवीआर में पचास फीसदी का डिस्काऊंट और धरने पर आने वाले सभी लोगों को दिल्ली के समस्त फ्लेट्स का 90 फीसदी आरक्षित कर दिया जाए, ऐसा इसलिए क्योंकि दिल्ली के बहुत लोग राम लीला ग्राऊंड के धरने में आऐ थे। लोधी रोड को मोदी रोड बनाने की कवायद के बाद तो अमेरिका में भी सिंधी बिरादरी ने बराक ओबामा को यहां तक कह दिया कि क्यों न युनाइटिड स्टेटस अमेरिका का नाम बदलकर उल्हासनगर सिंधी एसोसिएशन कर दिया जाए। इस प्रस्ताव पर प्रतिक्रिया देते हुए बाद में डोलाल्ड ट्रंप ने यहां तक डाला कि सिंधी अब इस देश में नहीं आएंगे, जिन्हें ओबामा ले आए वो आज गए कि कल, मामला खत्म। खैर केजरीवाल सरकार की सख्ती के चलते लोधी रोड अभी तक मोदी रोड नहीं बन पाया है।

जब से आदित्यनाथ योगी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने हैं उन्होंने तो मानो कसम ही खा रखी है कि यूपी में हर पुरानी परियोजना, संस्था या योजना का नाम बदल ही देना है। उन्होंने ने कानपुर के पानकी रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर पानकी धाम कर दिया। अब ये बात तो सभी जानते हैं कि धाम तो हिंदुओं का पवित्र स्थल होता है, इससे कोई शक नहीं रह जाता कि योगी की मनसा केवल हिंदु नामकरण तक ही महदूद है। कानपुर एअरपोर्ट का नाम गणेश शंकर विद्यार्थी करने की भी योजना है। इससे पहले वो मुगलसराय रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर संघी नेता दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर रख चुके हैं। सुना है कि आगरा एअरपोर्ट भी उपाध्याय के नाम से जाना जाएगा।

बात केवल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेताओं तक सीमित नहीं है, गोरखपुर के एअरफोर्स एअरपोर्ट का नाम भी बदलकर महायोगी गोरखनाथ के नाम पर होगा क्योंकि गोरखनाथ, नाथ संप्रदाय के मुखी थे जो योग गुरु माने जाते हैं। योगी आदित्यनाथ कई बार कह चुके हैं कि अभी तो और नाम बदले जाने हैं। स्थानीय लोग जानते हैं कि गोरखपुर का सांसद रहते समय योगी ने वहां के उर्दू बाजार को हिंदी बाज़ार, मियां बाज़ार को माया बाज़ार, इस्लामपुर को ईश्वरपुर, हुमायुं नगर को हनुमान नगर और अलीनगर को आर्यनगर में बदल दिया था। एक साक्षात्कार में योगी ने कहा कि यदि ज़रूरत पड़ी तो वो ताज महल का नाम बदलकर राम महल करने से भी नहीं हिचकिचाएंगे।

भाजपा का इस मामले में एक सूत्री कार्यक्रम ये नज़र आता है कि कांग्रेसी नेताओं के नाम पर बने सभी स्थलों का नाम हिंदु धर्म के गुरुओं और संघ के नेताओं के नाम पर रख दिया जाए। अपने करीब तीन साल के कार्यकाल में मोदी ने संघ नेताओं दीन दयाल उपध्याय, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और अन्य नेताओं के नाम पर बहुत से स्थलों का नामकरण कर दिया है। उन्होंने तो राजीव गांधी के नाम पर चल रही एक योजना को अपना बनाने के लिए उसका नाम सौभाग्य योजना बना दिया। स्वयं 2016 में बजट पेश करते समय उन्होंने बताया था कि चार योजनाओं से राजीव गांधी का नाम हटाकर उपाध्याय का नाम जोड़ दिया गया है जिनमें ग्रामीण बिजलीकरण योजना भी एक थी।

मोदी भगत रामनाथ कोविंद जब देश के राष्ट्रपति बने तो उन्होंने शपथग्रहण के बाद देश की स्वतंत्रता और आज़ादी के बाद विकास का सेहरा जिन लोगों के सिर बांधा उनमें जवाहर लाल नेहरू का नाम शामिल नहीं था। मीडिया ने इसे चूक कहकर किनारा कर लिया था जबकि असलियत ये है कि ये जानबूझकर की गई गल्ती थी। ये भाजपा की नीति का हिस्सा ही था कि नेहरू गांधी खानदान को भारत के इतिहास से हटाया जाए। कांग्रेस नेता शशि थरूर ने जब एक उदाहरण देकर इस आशंका को सही सिद्ध करना चाहा तो सामने आया कि नेहरू-गांधी काल की 23 योजनाओं एवं परियोजनाओं के नाम भाजपा सरकार बदल चुकी है।

कोई हरियाणा राजभवन में उपाध्याय का बुत लगवा रहा है, कोई किसी पार्क में उनका बुत लगवाने की तैयारी में है लेकिन सब भूल रहे हैं कि वक्त की गर्द छंटेगी तो ये सब धूल में मिल जाएगा। देश के युवाओं को नई दिशा देने के लिए क्या किया जा रहा है, इसकी समझ नहीं है। क्या नाम बदलने से किसी योजना का स्वरूप बदल जाएगा, या बुत लगवा देने से कोई और महान हो जाएगा? यदि ऐसा होता तो मायावती ने अपने जीवन काल में अपने ही जितने बुत लगवाए किसी और ने कभी न लगवाए होंगे, परंतु मायावती इस समय है कहां, हर कोई जानता है। 

 

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