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आश्चर्य: दावोस में मोदी ने भारत के मतदाताओं की संख्या बताई 600 करोड़

January 26, 2018 09:51 PM

मोदी भक्त मीडिया ने आंख बंद करके वो सब छापा जो प्रधानमंत्री ने कहा

स्व सेंसर : ज्य़ादातर अखबारों, चैनलों ने खुद ही ठीक कर लिया गल्ती को

दिल्ली : भारत की जनसंख्या भले ही सवा करोड़ से ऊपर न हो लेकिन जिन मतदाताओं ने 2014 में भारतीय जनता पार्टी को वोट देकर नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाया उनकी संख्या थी 600 करोड़। जी हां, ये संख्या 600 करोड़ ही थी। ये आंकड़ा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम के मौके दावोस में अपने भाषण के दौरान पेश किए। मोदी ने डींग मारते हुए कहा कि ऐसा भारत के इतिहास में पहली बार हुआ कि भारत के 600 करोड़ मतदाताओं ने इतना बड़ा फैसला लेते हुए भाजपा को विजयी बनाया। सवा करोड़ देश वासी मोदी की इतनी बड़ी गप्प सुनकर हैरान रह गए। मोदी ने गर गलत कहा था तो इसके लिए प्रधानमंत्री कार्यालय या स्वयं मोदी की ओर से इस गप्प का खंडन किया जाना चाहिए था लेकिन नहीं किया गया। इसे मोदी के प्रति अंधी भक्ति ही कहा जाएगा कि मीडिया के अधिकांश चैनलों और पत्र पत्रिकाओं ने देखा तक नहीं कि मोदी कह क्या कर रहे हैं। मज़ेदार बात ये कि मोदी जी का 600 करोड़ मतदाताओं के बयान वाला टवीट् नेट पर काफी देर रहा।

दावोस सम्मलेन को संबोधित करते हुए मोदी ने कहा, 2014 में 30 साल बाद,600 करोड़ भारतीय मतदाताओं ने पहली बार किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत दिया। ये एक ऐतिहासिक जीत थी। यहां सवाल ये भी उठता है कि जहां बात आॢथक सुधारों, आर्थिक नीतियों की होनी चाहिए वहां अपनी जीत को बढ़ा चढ़ा कर पेश करने की ज़रूरत भी क्या थी। सवाल ये भी है कि यदि प्रधानमंत्री ने बढ़ा चढ़ा कर कुछ कह भी दिया या फिर मान लो कि उनकी ज़ुबान ही फिसल गई थी तो फिर मीडिया को तो इसे इस तरह नहीं दिखाना चाहिए था। लेकिन स्वामिभक्ति  भी तो कोई शय है। जैसा कि चैनलों और अखबारों को आदेश दिया जाता है कि वे प्रधानमंत्री के बयानों को अक्षरश: पेश करें, तो फिर कोई देखता ही कहां है कि हो क्या रहा है। जो मैटर प्रधानमंत्री कार्यालय से आया वही हू ब हू छप गया। अब लोग सवाल उठाते हैं तो उठाते रहें। लेकिन किसी को फर्क पड़े या न पड़े, इससे भारत बदनाम हुआ। जब इसका अहसास हुआ तो पीएमओ कार्यालय ने ये टवीट् डिलीट कर दिया।

मज़ेदार बात ये है कि जब कुछ अग्रणी टीवी चैनलों को इस $गल्ती के चलते अपनी जिम्मेवारी का अहसास हुआ तो उन्होंने तत्काल उस टवीट् को दिखाना बंद कर दिया। इसे स्वघोषित सेंसरशिप कहा जा सकता है। फिर भी कुछ चैनलों यहां तक कि बड़ी न्यूज़ एजेंसियों ने भी मोदी की गप्प की ओर ध्यान नहीं दिया। ऐसा सिर्फ इसलिए नहीं हुआ कि कोई प्रधानमंत्री जैसे बड़े कद के नेता के बयान को झुठलाए कैसे, बल्कि इसलिए हुआ कि देश में प्रेस को जो आज़ादी है, उसे ठीक से नहीं लिया जाता। प्रेस फ्रीडम इंडेक्स ने जब 2017 के आंकड़े पेश करते हुए भारत को विश्व में 136वां रैंक दिया तो उसका कारण यही बताया गया कि भारत की प्रेस में स्वघोषित सेंसरसिशप बढ़ती जा रही है, विशेषकर मुख्य धारा के समाचार पत्रों और चैनलों में। मोदी के गल्त बयान को स्वयं ही ठीक करके परोसने वाले अखबारों और चैनलों की सोच से प्रेस फ्रीडम इंडेक्स के आंकड़ों को बल मिला है। प्रेस सही बात को सही ढंग से पेश ही नहीं कर पाई, गल्ती थी तो इसे तसलीम किया जाना चाहिए था, पीएम ऑफिस की ओर से बयान आना ही चाहिए था, लेकिन प्रेस ने तो मोदी के 4यान को स्वयं ही सेंसर कर दिया। 

दावोस सम्मलेन को संबोधित करते हुए मोदी ने कहा, 2014 में 30 साल बाद,600 करोड़ भारतीय मतदाताओं ने पहली बार किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत दिया। ये एक ऐतिहासिक जीत थी। 

ये पहली बार नहीं हुआ है कि मोदी की ज़ुबान फिसली हो या उन्होंने गल्त बयान दिया हो, देखने वाली बात ये है कि दावोस में भारत की जो छवि खराब हुई, उसके लिए कौन कौन जिम्मेवार है। मोदी ने एक बार भूटान के संयुक्त सदन को संबोधित करते हुए भूटान को नेपाल कह दिया था तो वहां बैठे लोगों में सुगबुगाहट हुई कि क्या मोदी नहीं जानते कि नेपाल और भूटान में क्या फर्क है। यहां तक कि भाषण की समाप्ति पर भूटानी लोगों ने तालियां तक नहीं बजाईं, ज़ाहिर है वे इस बात से काफी खफा थे। कहा जा सकता है कि तब मोदी नए नए प्रधानमंत्री बने थे, लेकिन अब तो काफी वक्त गुज़र चुका है, अब तो समझ आ जानी चाहिए। इससे पहले 2013 में मोदी ने महात्मा गांधी का पूरा नाम मोहनदास कर्मचंद गांधी की बजाए मोहनलाल कर्मचंद गांधी बताया था। यहीं बस नहीं इससे भी पहले उन्होंने जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी को शहीद बताते हुए यहां तक कह दिया कि वो 1930 में शहीद हुए, मुखर्जी की आखिरी इच्छा थी कि उनकी अस्थियां भारत लाई जाएं, ये काम किसी भी कांग्रेस सरकार ने नहीं किया जबकि वे स्वयं मुखर्जी की अस्थियां भारत वापस लाए। बाद में उन्होंने इसके लिए अफसोस भी जताया क्योंकि जिसका वो जि़क्र कर रहे थे वो श्यामा प्रसाद मुखर्जी नहीं बल्कि क्रांतिकारी श्यामाजी कृष्ण वर्मा थे। मोदी को श्यामा प्रसाद मुखर्जी और श्यामा जी में कोई अंतर नज़र नहीं आया।

मोदी दरअसल आत्ममुग्ध रहते हैं। जब वो बोल रहे होते हैं तो किसी की मज़ाल नहीं होती कि बीच में कोई पर्ची भी लिखकर उनको दे सके कि आप गलत हैं। जब तक बात पता चलती है तब तक बहत वक्त गुज़र चुका होता है। अब जब मोदी ने कहा कि 600 करोड़ मतदाताओं ने वोट दिया तो चुनाव आयोग का आंकड़ा था कि 2014 में केवल 83 करोड़ 40 लाख मतदाता थे। इनमें से सभी ने तो मोदी को वोट नहीं दिया, तो फिर 600 करोड़ का आंकड़ा आया कहां से। ज़ाहिर है मोदी जो फेंक रहे होते हैं तो उसे झेलने के सिवाय और कोई रास्ता भी तो नहीं होता।

 

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