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निंदनीय : देश जल रहा है नीरो (मोदी) बांसुरी बजा रहे हैं

अमरजीत सिंह  | January 26, 2018 01:17 AM

पदमावत फिल्म की रिलीज के बाद कई राज्यों में करणी सेना का उपद्रव

आम आदमी पार्टी ने हिंसा को शर्मनाक करार दिया, मोदी की चुप्पी पर उठाए सवाल

सुबह का वक्त है, जयपुर में राजपूतों की करणी सेना के कई दल शहर में दहशत फैलाने की गरज से कई प्रमुख स्थलों की ओर कूच कर रहे हैं। मामला है फिल्म पद्मावत के रिलीज हो जाने का। एक दल बाइक्स पर सवार रैली निकालकर पद्मावत के नाम पर सरकार के खिलाफ नारेबाजी करता शहर से गुजर रहा है। एक दल के नकाबपोश सदस्य हाथों में नंगी तलवारें लिए भीड़ के रूप में आगे बढ़ रहे हैं। कुछ लोगों ने सडक़ के बीचों बीच पुराने टायरों को आग लगाकर रास्ता अवरुद्ध कर दिया है। लोग सहम के मारे घरों में कैद होकर रह गए। देश में, विशेषकर चार राज्यों में आग लगी हुई है और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बंसी बजा रहे हैं। देश के गणतंत्र दिवस पर राजपूतों की गुंडागर्दी के खिलाफ वो एक भी बयान  नहीं दे रहे। जनता जाए भाड़ में मोदी को सियासत करनी है। संजय लीला भंसाली ने शायद कभी सोचा भी न होगा कि जिस मनघडंत कहानी पर वो फिल्म बना रहे हैं उसका हश्र ऐसा भी हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद जनता की सुरक्षा दांव पर लग चुकी है।

मध्यप्रदेश, हरियाणा, गुजरात और राजस्थान, चारों राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है, केंद्र में भी भाजपा बैठी है, इन चारों राज्यों की ऐसी क्या दुर्बलता रही होगी कि वहां की सरकारों ने फिल्म पद्मावत को अपने यहां रिलीज करने की आज्ञा ही नहीं दी। फिल्म प्रोडयूसर ने सुप्रीम कोर्ट से रिलीज पर लगी स्टे को रद्द तो करवा लिया लेकिन करणी सेना की पीठ पर खड़ी सरकारों को अपने साथ न जोड़ पाए। अब सवाल ये भी है कि सरकार बड़ी है या करणी सेना? जवाब सीधा सा है, सरकार तो दबंगों से डरती है, यही काम कहीं दलितों ने किया होता तो अब तक न जाने कितनों को अंदर कर दिया गया होता, ये भारत के लोकतंत्र की विडंबना है कि यहां संविधान का निरादर करने वालों को भी कोई सज़ा नहीं दी जा रही। जयपुर के अतिरिक्त गुजरात में भी मोटरसाइकलों पर सवार हाथों में नंगी तलवारें किए नारेबाजी करते सरकार को धता बता रहे हैं। कैसे हैं ये राजपूत जो एक फिल्म से तो इतने डरे हुए हैं, मगर संविधान या कानून का भय उन्हें नहीं है।

सबसे बड़ा सवाल जो उभरकर सामने आ रहा है वो ये कि क्या एक फिल्म में इतनी ताकत है कि वो हज़ारों सालों की भारतीय या राजपूती परंपरा को तीन घंटे के शो से नेस्तो नाबूद कर दे। और ये भी कि राजपूतों पर ऐसी कौनसी आफत आ गई कि वो ये भी भूल गए कि उनकी संस्कृति तो गऊ गरीब की रक्षा करने की रही है, आज वो क्या कर रहे हैं। अब कोई राजपूत नेता या दूसरा सामने आकर ये नहीं कह रहा कि देश के सुरक्षा तंत्र को मत तोड़ो, फिल्म को फिल्म की तरह ही लो, ये कोई सच्चाई नहीं है। राजनीतिक दल इसे भी अपनी राजनीति के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। सबसे बड़ा दुख है ही इस बात का कि प्रधानमंत्री गणतंत्र दिवस पर दस देशों के प्रमुखों के सामने अपना सैन्य शक्ति प्रदर्शन तो करने जा रहे हैं, लेकिन ये नहीं दिखा रहे कि उनके पास तो इतनी भी श1ित नहीं है कि वो करणी सेना को ही नत्थ डाल सकें। सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि सरकारें फिल्म की रिलीज को सुनिश्चित करें, लेकिन सरकारें तो करणी सेना ही डर गई हैं, जनता की सुरक्षा क्या करेंगी। 

सबसे बड़ा सवाल जो उभरकर सामने आ रहा है वो ये कि क्या एक फिल्म में इतनी ताकत है कि वो हज़ारों सालों की भारतीय या राजपूती परंपरा को तीन घंटे के शो से नेस्तो नाबूद कर दे। और ये भी कि राजपूतों पर ऐसी कौनसी आफत आ गई कि वो ये भी भूल गए कि उनकी संस्कृति तो गऊ गरीब की रक्षा करने की रही है, आज वो क्या कर रहे हैं।

राजनीतिक दलों का हाल भी देखो। प्रधानमंत्री मोदी एक तरफ हिमाचल दिवस पर हिमाचल वासियों को बधाई दे रहे हैं तो दूसरी तरफ वोट दिवस पर चुनाव कमीशन को भी बधाइयां दे रहे हैं, लेकिन गुडग़ांव में स्कूली बस पर गुंडों के हमले की जानकारी होने के बावजूद उनके पास कहने को कुछ भी नहीं है। मानों करणी सेना को उनका मूक समर्थन मिल रहा हो। तभी तो किसी भी सरकार ने अभी तक किसी करणी सैनिक को गिरफतार नहीं किया है, और शायद करेंगे भी नहीं। देश भर में आगजनी हो रही है और सरकार खामोश है। दंगईयों के खिलाफ किसी भी नेता का स्वर मुखर न होना कई सवाल खड़े करता है। केंद्र सरकार कम से कम यही देख लेती कि आसियान देशों के प्रमुख जो हमारे गणतंत्र दिवस की परेड देखने यहां आए हैं, टीवी और अखबारों में छप रहे समाचारों को लेकर 1या सोच रहे होंगे।

करणी सेना के प्रमुख लोकेंद्र फिल्म रिलीज होने से पहले जयपुर में जब प्रेस कांफ्रेंस के दौरान कहते हैं कि फिल्म को रुकवाने के लिए वो गोली तक खाने को तैयार हैं तो सरकार को इशारा समझ में आ जाना चाहिए। यदि सरकार समझ गई होती तो भाजपा शासित हरियाणा, गुजरात और राजस्थान में हिंसा का तांडव न होता। सरकारों की बुजदिली के चलते बेचारे मल्टीप्लेक्स  एसोसिएशन ऑफ इंडिया वाले ही पीछे हट गए हैं और उन्होंने चार राज्यों में फिल्म का प्रदर्शन न करने की सोच ली है। केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ के लिए भी ये शर्म की बात है कि चूंकि वो स्वयं करणी सेना की जाति बिरादरी से आते हैं और वो इनको रोक नहीं पा रहे। यहां तक कि उनका भी कोई बयान अभी तक नहीं आया जिससे लगे कि सरकार जनसुरक्षा को लेकर चिंतित है। यहां तक कि चार राज्यों के मुख्यमंत्रियों का भी कोई बयान अभी तक नहीं आया है कि वो क्या कदम उठाने जा रहे हैं।

गुडग़ांव स्कूल की घटना पर यदि सबसे अधिक खेद और दुख प्रकट किसी ने किया है तो वो हैं अरविंद केजरीवाल। उन्होंने बस हमले की घटना पर टवीट् करते हुए चार राज्यों की सरकारों पर कई सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा, ये बहुत ही शर्मनाक है, इससे भी ज्य़ादा ये इस लिए घृणा करने लायक है क्योंकि राज्य सरकारों की मिलीभुगत और अकर्मण्यता के चलते ही ऐसा हो रहा है। यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी टवीट् किया कि सरकार जनता की सुरक्षा की जिम्मेवारी से भाग नहीं सकती। राहुल गांधी ने बच्चों की बस पर हुए हमले की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने कहा, ऐसा कोई भी कारण नहीं जो बच्चों के प्रति हिंसा को सही ठहराता हो। हिंसा और नफरत कमज़ोर लोगों के शस्त्र हैं। भाजपा देश को आग में झोंकने के लिए नफरत और हिंसा का सहारा लेती है।

इस बीच कमयुनिस्ट नेता ने कई राज्यों में फैली हिंसा को कानून व्यवस्था का नहीं बल्कि भाजपा की विचारधारा और राजनीति का मुद्दा करार दिया है। विदेश राज्यमंत्री भी फिल्म को कोस रहे हैं, करणी सेना को नहीं। सबसे अधिक दुखदायी तो ये है कि राजस्थान जहां सबसे अधिक आग लगी है वहां की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया ने बृहस्पतिवार को हिंसा के बारे कुछ न कहते हुए अपने राज्य के लोगों को नेशनल वाटर डे पर बधाई दी, अपनी मां विजयराजे सिंधिया की पुण्यतिथि पर उन्हेें श्रद्धांजलि भी दी लेकिन करणी सेना बारे या प्रभावित लोगों बारे कुछ भी टवीट् नहीं किया।

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