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सरकारी अधिकारियों के रहम-ओ-करम पर हैं पेंशन पाने वाले

January 24, 2018 11:12 PM

वृद्धावस्था पेंशन, शगुन योजना, सब जगह हो रहा है अर्जी घोटाला

आम आदमी पार्टी ने किया खुलासा, योग्य व्यक्ति नहीं ले पा रहे योजनाओं का लाभ

चंडीगढ़ : सरकार चाहे प्रकाश सिंह बादल की रही हो या कैप्टन अमरिंदर सिंह की, पंजाब के आर्थिक तौर पर कमज़ोर वर्ग को समाज सेवा के सपने दिखाने में कोई भी कम नहीं है। वृद्धावस्था पैंशन, शगुन स्कीम, बच्चों विशेषकर लड़कियों के लिए मुफ्त शिक्षा जैसी बातें सरकारी कागजों में तो खूब आंकड़े दिखा रही हैं जबकि असलियत ये है कि जिस लडक़ी की शादी पर शगुन दिया जाना होता है उसे ये कई बार तब नसीब होता है जब उसके बच्चे स्कूल जा रहे होते हैं। जो वृद्ध हैं, यदि उनकी राजनीतिक पहुंच नहीं है तो उन्हें कोई नहीं पूछता, यदि पहुंच है तो उम्र का तो कोई झंझट ही नहीं है। पिछले साल वृद्धावस्था पेंशन के 82,533 केस फर्जी पकड़े गऐ थे जो प्रकाश सिंह बादल सरकार के समय से चले आ रहे थे। अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि पेंशन लेने के लिए क्या कुछ अनिवार्य है। इसी प्रकार शगुन योजना का लाभ भी उन तक ही पहुंचता है जो किसी विधायक या सत्ताधारी पार्टी के सरपंच के नज़दीकी हों। ऐसे में समाज का क्या भला हो रहा होगा, कहने की ज़रूरत नहीं।

पंजाब में सत्ता में आने से पहले कैप्टन अमरिंदर सिंह सरकार ने जो लोक लुभावन नारे आम जनता को परोसे और जिनका जि़क्र कांग्रेस पार्टी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में भी किया, उनकी हकीकत क्या है, इसका खुलासा आम आदमी पार्टी के सुनाम से विधायक अमन अरोड़ा ने किया है। कोई भी ऐसी योजना सही ढंग से नहीं चल रही जिसे सामाजिक सुरक्षा और आमजन के लाभ के लिए चालू किया गया हो। अरोड़ा ने ई-सेवा पोर्टल के जरिए जुटाई जानकारी में बताया है कि किसी भी सेवा का लाभ मिलने की बात तो बाद में की जा सकती है यहां तो अर्जी ही स्वीकार नहीं की जा रही। पेंशन लाभ लेना हो या फिर शगुन योजना के तहत बेटी को सरकारी शगुन दिलवाना हो, पंजाब सरकार के अधिकारियों ने इसके लिए अपने स्वयं के ही मापदंड तय कर रखे हैं। ये अधिकारी ज्य़ादातर अर्जियों को अपने बल पर ही अस्वीकार कर देतें हैं, सेवा का लाभ लेना तो बहुत दूर की बात है। सरकार आंख बंद करके ये सब चलने दे रही है, आखिर आम आदमी कहां जाए।

मानसा के विधायक अमन अरोड़ा ने वृद्धावस्था पेंशन योजना के एक घोटाले का पर्दा$फाश करते हुए पंजाब के मुख्यमंत्री और आरटीएस कमीशन को इसकी जांच की मांग के साथ साथ कोताही करने वालों के खिलाफ कड़ी और त्वरित कार्यवाई की मांग की है। मुख्यमंत्री मंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को लिखे पत्र में अरोड़़ा ने सरकार की महत्वाकांक्षी योजना सेवा का अधिकार में हो रहे नियमों के उल्लंघन का जि़क्र करते हुए कहा कि सरकारी कर्मचारी बिना किसी कारण अपनी मर्जी से ही पेंशन पाने के हकदार लोगों की अर्जियां रद्दी की टोकरी में फैंके जा रहे हैं जबकि सरकार को इसकी रत्ती भर भी सूचना नहीं दी जाती। जिन प्रार्थना पत्रों पर सात दिनों के अंदर कार्यवाई करना अनिवार्य है उनपर पहले तो महीनों कार्यवाई नहीं होती, फिर उन्हें अकारण रद्द कर दिया जाता है। 

ई-पोर्टल के जरिए जून 2017 में वृद्धावस्था पेंशन के लिए 31अर्जियां दायर की गई थीं। इनपर सात दिनों में कार्यवाई होना लाजि़मी था जबकि आठ माह बीत जाने पर भी कोई परिणाम सामने नहीं आया। आज भी तीन अर्जियां तो संगरूर के डीएसपीओ जोबनदीप कौर चीमा के हस्ताक्षरों के इंतज़ार में हैं जबकि बाकी 28 को अकारण रद्द कर दिया गया है।

जि़ला संगरूर में सुनाम विधानसभा क्षेत्र के गांव उभावाल का उदाहरण देते हुए अरोड़ा ने लिखा है कि यहां ई-पोर्टल के जरिए जून 2017 में वृद्धावस्था पेंशन के लिए 31अर्जियां दायर की गई थीं। इनपर सात दिनों में कार्यवाई होना लाजि़मी था जबकि आठ माह बीत जाने पर भी कोई परिणाम सामने नहीं आया। आज भी तीन अर्जियां तो संगरूर के डीएसपीओ जोबनदीप कौर चीमा के हस्ताक्षरों के इंतज़ार में हैं जबकि बाकी 28 को अकारण रद्द कर दिया गया है। अरोड़ा ने कहा कि ये मात्र एक उदाहरण है जबकि ऐसे अनेकों मामले गिनाए जा सकते हैं जहां सरकारी कर्मचारी और अधिकारी स्वयं ही सरकार बने बैठे हैं और आम जन दफतरों के चक्कर काट काट कर थक जाता है। ऐसे में जिन्हें सहायता की आवश्यकता है वह सहायता वंचित रह जाते हैं और सरकारी सहायता कुछ खास लोगों तक ही महदूद होकर रह जाती है।  बता दें कि जब पिछले साल जब वृद्धावस्था पेंशन के 82433 फर्जी मामले प्रकाश में आए तो सरकार को 1 लाख 64000 पेंशनरों की पेंशन रोकनी पड़ी। असलियत ये है कि जो भी फर्जी पेंशनर पकड़े गए वो सब सरकारी कर्मचारियों और सत्ताधारी नेताओं की मिलिभुगत से पेंशन ले रहे थे। यहां तक कि अपने बताए गए पते पर मिले ही नहीं। ज़ाहिर है कि ये पेंशनर भी केवल कागजों में ही मौजूद थे जिनका पेंशन का पैसा सरकारी कर्मचारियों और सत्ता पक्ष के नेताओं की जेब में जा रहा था। यहां तक कि जो पेंशनर्स मर चुके थे उनकी पेंशन का पैसा भी नेताओं की जेब में कई बरसों से जा रहा था। हैरानी की बात है कि जो असल में पेंशन के हकदार हैं उनकी तो अर्जियां ही रद की जा रही हैं और जो नकली हैं या मर चुके हैं, उन्हें पेंशन दी जा रही है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि सभी 22 जि़लों में करीब 10.48 सदी नकली पेंशनधारी पाए गए हैं। 

 नेशनल कमीशन फॉर एससी एंड एसटी ने राज्य के जि़लाधिकारियों को आदेश दिया है कि वे शगुन योजना का लाभ पाने वालों की जानकारी कमीशन को दें। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि करीब एक सौ व्यक्तिओं ने कमीशन से गुहार की थी कि शगुन योजना का लाभ उपयुक्त परिवारों को नहीं मिल रहा जबकि राजनीतिक लोगों के नज़दीकी अयोग्य होते हुए भी लाभ ले रहे हैं।

यहीं बस नहीं पेंशन योजना के नाम पर भी भारी घोटाला हुआ है। यहां तक कि नेशनल कमीशन फॉर एससी एंड एसटी ने राज्य के जि़लाधिकारियों को आदेश दिया है कि वे शगुन योजना का लाभ पाने वालों की जानकारी कमीशन को दें। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि करीब एक सौ व्यक्तिओं ने कमीशन से गुहार की थी कि शगुन योजना का लाभ उपयुक्त परिवारों को नहीं मिल रहा जबकि राजनीतिक लोगों के नज़दीकी अयोग्य होते हुए भी लाभ ले रहे हैं। कमीशन को सूचना मिली थी कि पांच करोड़ से अधिक की धनराशी सरकार ने सरेंडर कर दी थी जबकि ये धन गरीबों की कन्याओं के विवाह के लिए दिए जाने के लिए आरक्षित था। यहां तक कि कुछ जि़लों का शगुन योजना का रिकॉर्ड कमीशन ने अपने मुख्यालय  पर तलब भी किया था, सिर्फ इसलिए कि कैग यानि कट्रोलर एंड अकाऊंटेंट जनरल ने भी भी इस बात का खुलासा किया था कि कुछ मामलों में राज्य सरकार ने कन्याओं को शगुन का पैसा भेजने में चार साल से भी अधिक का समय लिया।

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