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आम आदमी पार्टी के 20 सदस्यों के निलंबन का विवाद गहराया

January 22, 2018 10:05 PM

पार्टी न्याय की मांग लेकर आज फिर से दायर करेगी नई याचिका

न्यायपालिका, चुनाव आयोग और राष्ट्रपति कार्यालय में तालमेल की कमी

दिल्ली : भले ही इस बात की उम्मीद बहुत ही कम है कि नरेंद्र मोदी सरकार आम आदमी पार्टी को किसी प्रकार राहत हासिल करने के आड़े नहीं आएगी फिर भी न्यायपालिका पर पूर्ण विश्वास रखते हुए पार्टी अपने 20 विधायकों की सदस्यता रद्द करने के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में फिर से एक याचिका दायर करेगी। लाभ का पद लेने के झूठ के चलते विधायकों की सदस्यता रद़द होने के बाद आम आदमी पार्टी के छह विधायकों ने इस फैसले के खिलाफ दायर एक याचिका सोमवार को वापस ले ली थी। अब फिर से मंगलवार को नई याचिका के जरिए चुनाव आयोग के फैसले को ललकारा जाएगा। पार्टी नेताओं का कहना है कि पार्टी हार मानने वाली नहीं है, इस लड़ाई को जनता के द्वार तक ले जाया जाएगा और न्यायपालिका के साथ साथ जनता से भी इंसाफ की मांग की जाएगी। 

एक तरफ जहां चुनाव आयोग के फैसले पर दुनिया भर के राजनीतिक दल हैरानी व चिंता प्रकट कर रहे हैं तो दूसरी तरफ ये सवाल भी उठ रहा है कि कानून एवं न्याय विभाग मंत्रालय ने भी आम आदमी पार्टी से बदला लेने में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी।

एक तरफ जहां चुनाव आयोग के फैसले पर दुनिया भर के राजनीतिक दल हैरानी व चिंता प्रकट कर रहे हैं तो दूसरी तरफ ये सवाल भी उठ रहा है कि कानून एवं न्याय विभाग मंत्रालय ने भी आम आदमी पार्टी से बदला लेने में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी। चुनाव आयोग ने जिस दिन राष्ट्रपति कार्यालय को सिफारिश की कि आप के 20 विधायक लाभ के पद पर बने रहने के कारण विधायक नहीं बने रह सकते, अत: उनकी सदस्यता को रद्द किया जाए तो दूसरे दिन रविवार होने के बावजूद राष्ट्रपति की सहमति हासिल होते ही कानून व न्याय विभाग मंत्रालय ने तत्काल नोटिफिकेशन जारी करके विधायकों की सदस्यता को रद्द करार दे दिया। ये भारत के लोकतंत्र व इतिहास में एकमात्र ऐसी घटना है जिसका इससे पहले कहीं कोई उदाहरण नहीं मिलता।

एक बात और जो खास तौर पर उभर कर सामने आई है वो ये कि चुनाव आयोग के वकील को वस्तुस्थिति का कोई ज्ञान ही नहीं था जबकि वह सरकार की ओर से विधायकों की सदस्यता रद्द करने को लेकर केस की पैरवी कर रहा था। गत शुक्रवार को जब दिल्ली हाईकोर्ट में इस मामले की सुनवाई हो रही थी तो जज ने जब कहा कि अदालत को 22 जनवरी तक सूचित किया जाए कि क्या विधायकों की सदस्यता को लेकर राष्ट्रपति महोदय को चुनाव आयोग की ओर से कोई पत्र लिखा गया है तो आयोग के वकील अमित शर्मा ने ये कहा कि उसे ऐसी कोई जानकारी नहीं है। ये कितनी हैरानी की बात है कि जो बात मीडिया के जरिए सारे भारत को पता थी वही बात चुनाव आयोग के वकील को पता नहीं थी। जब तक वकील ये जानकारी अदालत को बताते तब तक तो राष्ट्रपति भी अपनी सहमति दे चुके थे, विधायकों की सदस्यता रद्द करने के लिए।

सोमवार को एक तरफ जहां आम आदमी पार्टी के विधायक हाईकोर्ट से अपनी याचिका वापस ले रहे थे वहीं जस्टिस रेखा पल्ली ने अपने फैसले में कहा कि अब जबकि राष्ट्रपति विधायकों की सदस्यता समाप्त करने का आदेश दे ही चुके हैं तो ये याचिका अपने आप में निष्फल हो जाती है। ज्ञात हो कि राष्ट्रपति की अप्रूवल मिलते ही कानून एवं न्याय मंत्रालय ने नोटिफिकेशन जारी करते हुए कहा कि ऐसे में दिल्ली विधानसभा के 20 सदस्यों की सदस्यता जीएनसीटीडी (गवर्नमेंट ऑफ नेशनल कैपीटल टैरीटरी ऑफ देहली) अधिनियम के तहत समाप्त की जाती है। इसे कानून का मज़ाक ही कहा जाएगा कि एक तरफ वकील को पता नहीं कि आयोग ने कोई पत्र राष्ट्रपति को लिखा या नहीं, दूसरी ओर चुनाव आयोग एक दिन का भी इंतज़ार नहीं करता और सदस्यता रद्द करने का सिफारिशी खत राष्ट्रपति को भेज देता है जबकि पत्र भेजने के दूसरे ही दिन मामले की सुनवाई थी और तीसरे राष्ट्रपति के पास जहां इस प्रकार के मामलों पर विचार के लिए 15 दिन का समय है, वहां से उसे उसी दिन सम्मति दे दी जाती है और अंत में रविवार होने के बावजूद कानून एवं न्याय मंत्रालय नोटिफिकेशन भी जारी कर देता है।

इस बीच आम आदमी पार्टी के 20 विधायकों के निलंबन के एक तरफा फैसले की चहुं ओर से निंदा जारी है। चुनाव आयोग तो पहले ही संदेह के घेरे में था अब राष्ट्रपति कार्यालय की जल्दबाजी भी चर्चा का विषय बन गई है। भाजपा सरकार के दबाव तले आए इस फैसले के खिलाफ स्वयं भाजपा नेता भी हैरान हैं। शिव सेना इस फैसले को तानाशाही की तस्वीर  करार दे रही है। भाजपा नेता एवं पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने चुनाव आयोग के इस फैसले को तुगलकी आदेश की संज्ञा दी है। फिल्म अभिनेता का स्वर भी काफी मुखर है। उन्होंने अपने नेता नरेंद्र मोदी की तानाशाही पर कई सवाल खड़े किए। जैसे पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री  ममता बैनर्जी इसे चुनाव आयोग द्वारा राजनीतिक दुरुपयोग बता रही हैं वैसे ही शिव सेना के राज्यसभा सांसद संजय राऊत इसे तानाशाही फैसला करार दे रहे हैं।

 

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