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मोदी जी आन्दोलन से उठी इस आग 'आम आदमी पार्टी' की ज्वाला को कभी बुझा नहीं सकोगे

गोपाल शर्मा | January 21, 2018 01:49 PM

 

                     आम आदमी पार्टी के  २० विधायकों के खिलाफ एक बार फिर एक और प्रहार, एक और कोशिश हमें हराने की, हमें नेस्तानाबूद करने की, बर्वाद करने की..........

 देश क्या विश्व के इतिहास में ऐसा संभवतयः पहली बार लोक तंत्र के माथे पर हमारे माननीय प्रधानमंत्री के सौजन्य से इतना बड़ा कलंक का टीका लगने जा रहा है कि भाजपा की अगली कई पीड़ियों के वंशज भविष्य में चाहकर भी इस कलंक को मिटा नहीं पाएंगे..........। 

 खैर इनका काम है चुनौतियां खड़ी करना, हमारा काम है उसे हंसते-हंसते पार कर सिर्फ जनता की सच्ची सेवा में तल्लीन रहना, और वही हम कर रहे हैं। 20 विधायकों की सदस्यता समाप्त करने के इस निर्णय को यदि अमल में लाया गया तो इसके उपरांत आम आदमी पार्टी के कार्यों में देश और गति देखेगा, और उर्जा दिल्ली में नेताओं और कार्यकर्ताओं में नज़र आएगी..

 मोदी जी आपके जुमलों से गुमराह देश की कुछ फीसदी सोयी जनता जिस क्षण जाग गयी... और उसने आपके जुमले सुनने बंद कर, सिर्फ सच्चाई और ईमानदारी की आवाज सुननी शुरू कर दी तब वह आपसे चुभते प्रश्न पूछने लगेगी......... वह आपसे अवश्य पूछेगी कि आखिर बिना लाभ लिए लाभ के दोष में दिल्ली के 20 विधायक कैसे लाभ के दोषी ठहराए गए........

 जनता पूछेगी कि दिल्ली को मुफ्त पानी] आधे दामों पर बिजली] मुफ्त चिकित्सा का लाभ देकर दिल्ली को अंतर्राष्टरीय स्तर पर पहचान दिलाने वाले केज़रीवाल के सामने चुनौतियों के इतने विशाल पहाड़ क्यों खड़े किए गए................  

क्यों जनता द्वारा दिए गए तमाम अधिकारों का पूरी तरह दुरूप्योग करते हुए मोदी जी दिल्ली की जनता से अरविंद केज़रीवाल के हाथ रोक कर कदम-कदम पर बदला ले रहे थे-------------------------------

 क्यों कभी निर्दोष विधायकों पर एक के बाद एक फर्जी मुकद्दमें कायम कर उन्हें गिरफ्तार किया जाता है ................

क्यों कभी मुख्यमंत्री........ उपमुख्यमंत्री व मंत्रियों समेत विधायकों के घरों, दफ्तरों पर सीबीआई की रेड डलवा कर उन्हें डराया- धमकाया जाता है.

 क्यों आम आदमी पार्टी के साफ-सुथरे परादर्शी खातों में आए चंदे को आपका आयकर विभाग अवैध घोषित करने पर तुल जाता है.

 क्यों उलजुलूल इल्ज़़ाम लगा कर भाजपाई आम आदमी पार्टी को भी कांग्रेस, भाजपा जैसी भ्रष्ट और बेईमान पार्टी साबित करना चाहते हैं.

 साथियों मैं बताता हूं कि क्यों भारतीय जनता पार्टी समेत तमाम भ्रष्ट तंत्र समय-समय पर आम आदमी पार्टी में भी भीविषण और जयचंद तलाशता है\

          इसका उत्तर है दिल्ली के चमचमाते स्कूल, विश्वस्तर की हो चली यहां की मुफ्त स्वास्थ्य व्यवस्था, मुफ्त दिया जा रहा 20000 लीटर पानी, आधे दामों पर दी जा रही बिजली, और दिल्ली की हर गली, हर मौहल्ले में हो रहा ऐसा विकास जैसा पहले न कभी देखा गया और न ही सुना गया।

 दोस्तों जरा सोचिए आम आदमी पार्टी ने क्या गलत किया जिसकी उसे समय-समय पर सजा दी जाती है. सिवाय जन सेवा के .....

           खैर इनका काम है चुनौतियां खड़ी करना, हमारा काम है उसे हंसते-हंसते पार कर सिर्फ जनता की सच्ची सेवा में तल्लीन रहना, और वही हम कर रहे हैं। 20 विधायकों की सदस्यता समाप्त करने के इस निर्णय को यदि अमल में लाया गया तो इसके उपरांत आम आदमी पार्टी के कार्यों में देश और गति देखेगा, और उर्जा दिल्ली में नेताओं और कार्यकर्ताओं में नज़र आएगी................. ऐसा इसलिए होगा क्योंकि हम विरोधियों की धृष्टता और अपना जुनून दोनों को भली भांति पहचानते हैं.....................।

 हमें अपने नेता अरविंद केजरीवाल की ईमानदारी, निष्ठा, जुनून व दृढ़ता पर जितना यकीन है उतना ही यकीन विरोधियों के षड़यंत्र, धृष्टता व नीचता पर भी है.......................।

मोदी जी! हम आंदोलनकारी हैं, लहू के एक-एक बूंद की आहूती देकर भी टस से मस न होने की कसम तब तक के लिए है जब तक दिल्ली ही नहीं बल्कि पूरे देश से भ्रष्ट व्यवस्थाओं का खात्मा नहीं हो जाता..................।

मोदी जी एक निवेदन है आपसे कि देश ने बड़ी उम्मीदों से आपको सत्ता सौंपी थी, आप देश को रोजगार के नाम पर जी.टीवी के बाहर समोसे-पकोड़े बेचने का आइडिया अपने पास रखें क्योंकि देश के युवाओं को रोजगार के नाम पर आपका यह एक और जुमला बर्दाश्त नहीं होगा.

गंभीरता से विचार कीजिए, केवल अडानी-अंबानी की उन्नति देश की उन्नति नहीं है................! अपने घोषणा पत्र पर नज़र डालिए मैं यकीन से कह सकता हूं कि आपको खुद अपने आप पर शर्म आएगी। 

अब बात करते हैं बीस विधायकों के इस मसले पर दोहरे मानदंडों की।

भारतीय न्यायपालिका की ये विडंबना सदा से रही है कि एक ही कानून की व्याख्या दो जज अलग-अलग तरह से करते आ रहे हैं।............ लाभ के पद की व्याख्या को लेकर जब आम आदमी पार्टी के विधायकों की सदस्यता समाप्त करने के खिलाफ सुनवाई हो रही थी तो शुक्रवार को माननीय जज ने कहा कि आम आदमी पार्टी ने संसदीय सचिवों को नियुक्त करने के लिए उपराज्यपाल की सहमति क्यों नहीं ली................ दूसरी ओर जब पंजाब में प्रकाश सिंह बादल ने 18 संसदीय सचिव नियुक्त किए, उनके खिलाफ पीआईएल दायर हुई तो पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट के माननीय जज ने कहा था कि ये संसदीय सचिव जूनियर मंत्रियों की तरह काम कर रहे हैं जिनकी नियुक्ति का अधिकार न तो राज्य सरकार के पास है और न ही राज्यपाल के पास..............। अब यदि पंजाब का राज्यपाल ऐसी नियुक्ति को हरी झंडी नहीं दे सकता तो क्या दिल्ली का उपराज्यपाल ऐसा कर सकता है.................. यदि नहीं तो फिर एलजी की सहमति का सवाल कहां से आया और इसी सवाल को विधायकों की सदस्यता रद्द करने का आधार क्यों बनाया जा रहा है......

संसदीय सचिवों की नियुक्ति को लेकर आम आदमी पार्टी के विधायकों की सदस्यता रद्द करने का चुनाव आयोग का फैसला कहां तक जायज है......... ये सवाल इस लिए उठ रहा है कि इनसे पहले भारतीय जनता पार्टी, शिरोमणि अकाली दल, सरकार और कांग्रेस सहित अन्य पार्टियां भी तो ये सब करती आई हैं.................... तो फिर चुनाव आयोग को अरविंद केजरीवाल का फैसला ही क्यों चुभा \

 प्रकाश सिंह बादल ने पंजाब में लगातार दूसरी जीत दर्ज करके 2012 में 18 संसदीय सचिव नियुक्त किए थे। क्योंकि भारतीय जनता पार्टी अकाली सरकार का हिस्सा थी इसलिए चार भाजपा विधायकों को भी संसदीय सचिव बनाया गया..............।

चार साल तक तो उस याचिका पर सुनवाई ही नहीं हुई जो इसके खिलाफ थी। जब सुनवाई हुई तो फैसला आने तक सरकार का कार्यकाल समाप्त हो चुका था। मजेदार बात ये कि इस दौरान चार और विधायकों को बादल सरकार संसदीय सचिव बना चुकी थी, क्या ये संभव है कि यह बात भारतीय चुनाव आयोग तक पहुंची ही नहीं होगी.

चुनाव आयोग की दोगली नीति का भंडाफोड़ करने का समय आ गया है......। आज यदि आम आदमी पार्टी सरकार को अस्थिर करने के लिए निर्वाचन आयोग का खुलेआम दुरूउपयोग किया जा रहा है तो सवाल तो उठेंगे ही................। ध्यान दें...... छतीसगढ़ में सरकार बनाते समय किस तरह घोड़ों की खरीद-फरोख्त की तरह विधायक खरीदे बेचे गए, किस तरह घुड़ व्यापार हुआ था। 90 सदस्यीय छत्तीसगढ़ विधानसभा में आज भारतीय जनता पार्टी के रमन सिंह मुख्यमंत्री हैं....................। इनके पास 49 विधायकों का बहुमत है। समर्थन जुटाने के लिए इन्होंने 11 विधायकों को संसदीय सचिव बनाया............। चुनाव आयोग यदि आंख खुली रख रहा है तो इस ओर भी देखा जाना चाहिए। यदि आयोग अपनी अस्मिता को कायम रखते हुए 11 संसदीय सचिवों की सदस्यता समाप्त कर देता है तो भाजपा के पास केवल 38 विधायक रह जाएंगे.................। इसके विपरीत कांग्रेस के पास यहां 39 विधायक हैं. तो सरकार बनाने का पहला अधिकार किसे होगा \ जाहिर है कांग्रेस को..............लेकिन भारतीय जनता पार्टी इसे सहन कैसे कर सकेगी \

मजेदार बात ये है कि रमन सिंह सरकार के इन संसदीय सचिवों के खिलाफ याचिका दायर है और इनके लाभ लेने के सभी सबूत कोर्ट को सौंपे जा चुके हैं, जिसमें इनका वेतन, सरकारी कोठी और अन्य सुविधाओं का जिक्र तक है।

 चुनाव आयोग तो हाथी की तरह काम कर रहा है, इसके दांत खाने के और हैं, दिखाने के और। अब सवाल यह है कि चुनाव आयोग यदि दिल्ली के संसदीय सचिवों की सदस्यता रद्द करने की सिफारिश कर सकता है तो फिर छत्तीसगढ़ में क्यों नहीं..............।

 नैतिकता की दुहाई देने वाले आयोग को समझ लेना चाहिए कि केजरीवाल को सजा केवल उनकी ईमानदारी के कारण दी जा रही है। आयोग तो भाजपा की कठपुतली बना हुआ है, जो याचिकाएं इसके पास भाजपा के खिलाफ आती हैं उनकीं तो समय रहते राष्ट्रपति को अनुशंसा ही नहीं की जाती, जब याची हाईकोर्ट जा पहुंचता है तो जाकर आयोग की नींद खुलती है, फिर भी जब तक कार्यवाही होती है तब तक विधानसभा अपना कार्यकाल समाप्त कर चुकी होती है, पंजाब व हरियाणा के उदाहरण सबके सामने है.............।

किसी भी वैधानिक समस्या के लिए आम आदमी की अंतिम उम्मीद न्यायपालिका से होती है, लेकिन अब अदालतों के आदेशों की भी विडम्बना है, अदालतें भी दोगले किस्म के आदेश देती हैं................... एक ही तरह के अपराध में पंजाब में फैसला कुछ और होता है और पश्चिमी बंगाल में कुछ और।

 सरकारें चालाकी से काम लेती हैं, जहां अदालत किसी पद को लाभ का पद घोषित कर देती है वहां सरकार एक नया कानून बनाकर उसी पद को लाभ के दायरे से बाहर निकाल देती हैं, ऐसे में उसी पद के लिए जो सजा कोर्ट ने तय की होती है वह रद्दी की टोकरी में डाल दी जाती है................।

यहां तक कि चार साल तक पद पर बने रहने वाले को सरकार चार साल पुरानी तारीख से ही लाभ वाले पद की परिभाषा से बाहर निकालने का मादा रखती है।

इस तरह के उदाहरण दिल्ली और राजस्थान में आम देखे गए हैं। जब शीला दीक्षित ने अपने  संसदीय सचिवों को लाभ के पद से बाहर घोषित किया तो कोई शोर नहीं उठा क्योंकि केंद्र में कांग्रेस सरकार थी, जब केजरीवाल इसी तरह करते हैं तो मानो आसमान टूट पड़ा हो, क्योंकि केंद्र में उनकी सरकार नहीं है।

पंजाब सरकार में तो भाजपा सिर्फ साझेदारी में थी लेकिन हरियाणा में इसे बहुमत प्राप्त है। हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने भी तो चार विधायकों को संसदीय सचिव बनाया और उनके खिलाफ भी अदालत में याचिका चल रही है।

 2015 में वजूद में आई हरियाणा की भाजपा सरकार के खिलाफ चुनाव आयोग ने आज तक तो कोई कदम नहीं उठाया और लगता है कि अभी उठाएगा भी नहीं...................। यदि देश में कानून एक समान है तो उसी कानून का असर यहां भी होना चाहिए था क्योंकि गुनाह तो हरियाणा का भी वही है जो दिल्ली का था।

वैसे हरियाणा में इससे पहले भूपिंदर सिंह हुड्डा सरकार में भी संसदीय सचिव थे, उनकी नियुक्तियों को भी चैलेंज किया गया था लेकिन सरकार अपना कार्यकाल पूरी कर गई क्योंकि अदालती आदेश न आना था और न ही आया........... चुनाव आयोग तो वैसे भी अपने आकाओं के सामने खामोश ही रहता है। अब देखते हैं यह तमाशा कब तक चलता है...... किंतु हम फिर भी जानते हैं चाहे केंद्र से लेकर चुनाव आयोग तक जितना चाहे जोर लगा लो आम आदमी पार्टी का कुछ नहीं बिगाड़ सकोगे..........कान खोल कर सुन लो................हमें कुछ नहीं चाहिए...........छिनने पर नुकसान उसका होता है जिसे कोई मोह हो.................हम सेवा करने आए हैं और उससे तुम हमें कभी रोक नहीं पाओगे...........जनता चोरों और ईमानदारों में फर्क जानती है................कोई अदानी अंबानी बचा नहीं सकेगा............

गोपाल शर्मा की वीडियो से साभार

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