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चुनाव आयोग ने राष्ट्रपति से की 20आप विधायकों की सदस्यता रद्द करने की सिफारिश

January 19, 2018 11:29 PM

सच्चाई पर चलेंगे तो बाधाएं तो आएंगी ही- अरविंद केजरीवाल

इससे पहले चुनाव आयोग इतना नीचे कभी नहीं गिरा-आप नेता आशुतोष

राजनीतिक बदलाखोरी के लिए संवैधानिक संस्था का दुरुपयोग हुआ- ममता बैनर्जी

दिल्ली: लाभ के पद मामले में आम आदमी पार्टी के २० विधायकों की सदस्यता समाप्त करने की सिफारिश करके चुनाव आयोग ने सिद्ध कर दिया है कि सत्ता में रहते हुए कोई चुनाव आयोग को कैेसे निजि हितों के लिए इस्तेमाल कर सकता है। हालांकि इस मामले में न तो आयोग ने विधायकों के बयान सुने और न ही ये सिद्ध किया गया कि पार्लियामेंटरी सेक्रेटरी के रूप में तैनात विधायकों को क्या  कोई वेतन भी मिल रहा था, क्या  उन्हें सरकारी गाड़ी भी दी गई थी या नहीं। आम आदमी पार्टी नेता सौरभ भारद्वाज ने ठीक ही कहा है कि आगामी सोमवार को रिटायर होने जा रहे चुनाव आयुक्त  ए.के.जोती ने उन्हें गुजरात का मुख्य सचिव बनाए जाने के लिए नरेंद्र मोदी का कर्ज उतारने के लिए चुनाव आयोग को राजनीति के सामने गिरवी रख दिया है। पत्रकार से नेता बने आशुतोष ने मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि टी.एन.शेषन के समय रिपोर्टिंग का उनका तजुर्बा बता रहा है कि चुनाव आयोग इतना नीचे कभी नहीं गिरा।

चुनाव आयोग ने सितंबर २०१६ में आम आदमी पार्टी के २१ पार्लियामेंटरी सचिवों की नियुक्ति रद्द कर दी थी। कारण ये बताया गया कि कि ये विधायक लाभ के पदों पर आसीन हैं। आम आदमी पार्टी ने इस फैसले के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट का द्वार खटखटाया। हाईकोर्ट की कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश गीता मित्तल की अदालत ने शुक्रवार को पार्टी को अंतरिम राहत देने से इंकार करते हुए सवाल उठाया कि जब चुनाव आयोग ने बुलाया था तो पार्टी अपना पक्ष रखने वहां क्यों नहीं गई। इस बीच पता चला है कि चुनाव आयोग ने राष्ट्रपति  को सिफारिश की है कि सभी संसदीय सचिवों की विधायक के रुप में सदस्यता समाप्त कर दी जाए। क्योंकि  राष्ट्रपति चुनाव आयोग की सिफारिश मानने को बाध्य हैं इसलिए सभी संसदीय सचिवों की विधायक के रुप में सदस्यता पर कानूनी तलवार लटक गई है। आम आदमी पार्टी इसे राजनीतिक बदलाखोरी के रूप में देख रही है जिसके लिए चुनाव आयोग का इस्तेमाल किया गया है।

भले ही चुनाव आयोग ने २० (एक विधायक जरनैल सिंह इस्तीफा दे चुके हैं) विधायकों को अयोग्य घोषित करने की राष्ट्रपति को सिफारिश कर दी है परंतु इसका आम आदमी पार्टी सरकार पर कोई असर नहीं होने वाला। दिल्ली विधानसभा की कुल ७० सीटों में से ६६ पर आम आदमी पार्टी का कब्ज़ा  है ४ पर भाजपा का। बहुमत के लिए कुल ३६ सीटों की आवश्यकता  है। यदि २० विधायकों को अयोग्य घोषित कर भी दिया गया तो भी आम आदमी के पास ४६ का बहुमत रहेगा। भारतीय जनता पार्टी ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के इस्तीफे की मांग तो कर डाली लेकिन वो इस बात से अनभिज्ञ हैं कि कम से कम केजरीवाल सरकार पर कोई ऐसा संवैधानिक संकट नहीं है जो उनकी कुर्सी छीन सके। ये बात कुमार विश्वास और कपिल मिश्रा जैसे लोगों को भी समझ में आ जानी चाहिए कि चुनाव आयोग मोदी से दोस्ती तो निभा सकता है परंतु केजरीवाल की कुर्सी नहीं गिरा सकता।

ध्यान देने योग्य बात ये भी है कि दिल्लीवासी इस बात को भलीभांति समझते हैं कि आम आदमी पार्टी के साथ पहले दिल्ली के उप राज्यपाल धोखा करते आ रहे हैं अब बाकी की कसर चुनाव आयोग ने निकाल दी है। पार्टी के साथ अन्याय यहां तक हो रहा है कि देश भर के अखबारों में दूसरे राज्यों की सरकारों के विज्ञापन आम देखे जाते हैं जबकि आम आदमी पार्टी को दूसरे राज्यों में विज्ञापन देने के लिए चुनाव आयोग की ओर से ज़ुर्माना तक किया जा चुका है। यदि भारतीय जनता पार्टी विदेश से धन जुटाती है तो उसपर कोई असर नहीं लेकिन आम आदमी पार्टी जुटाए तो चुनाव आयोग इनके खिलाफ केस आरंभ कर देता है। जब केजरीवाल कहते हैं भाजपा दिल्ली की सरकार को अस्थिर करने की हर संभव कोशिश कर रही है, तो इतना सब देखकर क्या दिल्ली का नागरिक ये नहीं सोचेगा कि उनकी बात में वाकई  दम है। 

चुनाव आयोग ने सितंबर २०१६ में आम आदमी पार्टी के २१ पार्लियामेंटरी सचिवों की नियुक्ति रद्द कर दी थी। कारण ये बताया गया कि कि ये विधायक लाभ के पदों पर आसीन हैं। आम आदमी पार्टी ने इस फैसले के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट का द्वार खटखटाया। 

इस बीच अरविंद केजरीवाल ने टवीट् किया है कि जब आप ईमानदारी पर चलते हैं तो बहुत बाधाएं आती हैं, ऐसा होना स्वाभाविक है, परंतु ब्रहमांड की सारी दृश्य और अदृश्य शक्तियां आपकी मदद करती हैं। ईश्वर आपका साथ देता है, क्योंकि आप अपने लिए नहीं देश और समाज के लिए काम करते हैं, इतिहास गवाह है कि जीत अंत में सच्चाई की ही होती है। ऐसा भी नहीं है कि केवल केजरीवाल ने ही अपने राज्य में संसदीय सचिवों की नियुक्ति की हो। प्रकाश सिंह बादल सरकार में २१ संसदीय सचिव रह चुके हैं। हिमाचल में इनकी संख्या आठ रही है। संवैधानिक नियम कहता है कि किसी भी राज्य के विधायकों की संख्या  का १५ फीसदी मंत्री बनाए जा सकते हैं। लेकिन दिल्ली में कुल दस फीसदी मंत्री होना तय है। जब ६० सदस्यीय विधानसभा में मेघालय में कांग्रेस ने महज २९ सीटें जीतकर १८ संसदीय सचिव बना डाले तो किसी ने एतराज़ नहीं किया। जब बिना कोई लाभ दिए आम आदमी पार्टी ने ७० में से ६७ सीटें जीतकर २१ संसदीय सचिव बनाए तो एक कथित समाजसेवी संस्था राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा ने इसे चैलेंज कर दिया, परिणाम सामने है।

चुनाव आयोग के इस फैसले पर आम आदमी पार्टी के कुछ अन्य दलों ने कड़ी प्रतिक्रिया की है। पश्चिमी बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने केजरीवाल को अपना समर्थन देते हुए कहा है कि राजनीतिक बदलाखोरी के लिए किसी संवैधानिक पद का दुरुपयोग नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि २० विधायकों को सुने बिना ऐसा फैसला लेना बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। ममता ने कहा कि ऐसे मौके पर वह केजरीवाल के साथ हैं। आप नेता सौरभ ने कहा कि अचल कुमार जोती नरेंद्र मोदी का कजऱ् चुकाना चाहते हैं जिसे लेकर पार्टी हाईकोर्ट में अपील करेगी। उन्होंने कहा कि विधायकों पर लाभ के पद का आरोप $गलत है और इस पर आयोग ने कभी सुनवाई नहीं की। ज्ञात हो कि मोदी के मुख्यमंत्री काल में ऐके जोती तीन साल तक गुजरात के मुख्य सचिव रहे हैं।

 

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