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एफडीआई: मोदी करे तो सही, कोई और करे तो गलत 

ए.के.के.ब्यूरो | January 14, 2018 08:38 AM

कांग्रेस काल में 49 फीसदी एफडीआई पर उठाया बवाल अब 100 फीसदी का स्वागत

2012: मनमोहन देश को अंग्रेज़ों के हाथ दे रहे हैं, 2018 इससे रोज़गार बढ़ेगा

दिल्ली: किसी एक वर्ग को खुश करने की नीयत से मोदी सरकार ने सिंगल ब्रांड रिटेल में शत प्रतिशत विदेशी निवेश (फॉरेन डायरेक्ट इंवेस्टमेंट, एफडीआई) का मार्ग खोलकर निचले और मध्यम दर्जे के व्यापारियों की कब्र खोदने का काम किया है। जब मनमोहन सिंह सरकार ने रिटेल में 59 फीसदी विदेशी निवेश के लिए रास्ता खोलना चाहा तो यही मोदी थे जिन्होंने डटकर विरोध किया था। अब स्वयं ही शत प्रतिशत एफडीआई के झंडाबरदार बन गए हैं। मोदी की ये दोगली नीति व्यापारी वर्ग की समझ से परे हैं। आम आदमी पार्टी ने सरकार की इस नीति का विरोध करते हुए इसके खिलाफ आम जन को जागरूक करने का ऐलान किया है। इससे पहले भी आम आदमी पार्टी सौ फीसदी एफडीआई का विरोध करती आई है क्योंकि पार्टी का मानना है कि ऐसा करने के मंझोले कारोबारी तो बर्बाद ही हो जाएंगे।

नरेंद्र मोदी के सौ फीसदी एफडीआई के फैसले को किसी भी तरह से जायज या समझदारी का सौदा नहीं माना जा रहा। ये ज़रूर कहा जा रहा है कि इससे आरएसएस के साथ टकराव की संभावना और बढ़ सकती है जबकि संघ की चुप्पी कुछ और ही इशारा कर रही है। बता दें कि केंद्रीय मंत्रीमंडल ने हाल ही में रिटेल बिजनेस में सौ फीसदी विदेशी निवेष के साथ साथ इंडियन एअरलाइंस में 49 फीसदी विदेशी निवेश के लिए भी राह खोल दिया है। इससे एअरलाइंस के डिसइनवेस्टमेंट की प्रक्रिया को तेजी मिलेगी। प्रचार ये किया जा रहा है कि इससे विदेशी निवेशकर्ताओं को एक मैत्रीपूर्ण माहौल प्रदान किया जा रहा है ताकि अधिक से अधिक विदेशी कंपनियां भारत में निवेश करें जिससे व्यापार को गति मिले और देश में अधिक से अधिक विदेशी धन आए। देखने वाली बात ये भी है कि संघ परिवार विदेशी निवेश के हमेशा खिलाफ रहा है। संघ का आर्थिक मंच यानि स्वेदशी जागरण मंच और संघ की मजदूर इकाई भारतीय मज़दूर संघ एफडीआई को लेकर भाजपा की नीतियों के प्रबल विरोधी रहे हैं।

फिर ऐसा अचानक क्या हो गया कि भाजपा को ये लगने लगा कि विदेशी निवेश से भारत में रोज़गार को बढ़ावा मिलेगा और व्यापार को गति मिलेगी। ऐसा लगता है कि भाजपा और संघ के बीच अंदरखाते कोई ऐसा समझौता हो गया है जिसके चलते अब इसका विरोध नहीं हो रहा। हालांकि संघ ये कहता आया है कि विदेशी निवेश पारिवारिक और सामुदायिक तानेबाने को भी कमज़ोर कर देगा 1योंकि पारिवारिक और सामुदायिक कारोबारों पर विदेशियों का कब्ज़ा हो जाएगा। स्वदेशी जागरण मंच तो कांग्रेस काल में विदेशी निवेश को लेकर चल रही कार्यवाही को ही दूसरी ईस्ट इंडिया कंपनी की आमद करार देकर इसकी निंदा करता आया है, अब अचानक संघ का स्वर न केवल धीमा पड़ गया है बल्कि वह इस फैसले का अनुमोदन करता भी नज़र आ रहा है। 

आम आदमी पार्टी महसूस करती है कि मोदी के रिटेल में सौ फीसदी फैसले से भारत के छोटे और मझोले दूकानदार बहुत बुरी तरह प्रभावित होंगे जिसका अंदाज़ा मोदी सरकार को नहीं है।

 

आम आदमी पार्टी महसूस करती है कि मोदी के रिटेल में सौ फीसदी फैसले से भारत के छोटे और मझोले दूकानदार बहुत बुरी तरह प्रभावित होंगे जिसका अंदाज़ा मोदी सरकार को नहीं है। आम आदमी पार्टी प्रवक्ता आशुतोष ने इस बीच कहा है कि प्रधानमंत्री ने उसी सिंगल ब्रांड रिटेल में सौ फीसदी निवेश को अब सही ठहराया है जिसका वो जमकर विरोध करते रहे हैं। उन्होंने कहा कि जब मनमोहन सिंह सरकार ने एफडीआई में 49 फीसदी विदेशी निवेश की राह खोलनी चाही तो मोदी ने इसका खुला विरोध किया था और आज उसी रिटेल में निवेश के लिए सौ फीसदी निवेश की खुली छूट देकर व्यापारियों और कारोबारियों को बर्बाद करने का रास्ता खोल दिया है जिसके लिए मोदी को सही नहीं ठहराया जा सकता।

आम आदमी पार्टी का व्यापार सेल का स्वर भी मोदी के इस अप्रत्याशित फैसले को लेकर मुखर हो गया है। आप के व्यापार विंग के पदाधिकारी ब्रजेश गोयल कहते हैं कि मोदी ने मनमोहन सिंह सरकार से एक कदम आगे जाकर देश के व्यापार को तबाह करने का निर्णय ले लिया है। उन्होंने कहा कि छोटे कारोबारियों की दुकानें बंद हो जाएंगी और बड़ी कंपनियां धीरे धीरे भारत के सारे कारोबार पर एकाधिकार स्थापित कर लेंगी। मोदी को शायद तब पता चलेगा जब व्यापारी और कारोबारी भूखे मरने लगेंगे। आम आदमी पार्टी मोदी के इस फैसले को गंभीरता से ले रहे हैं और इसका विरोध करने के लिए आगामी 17 जनवरी को एक विरोध प्रदर्शन भी करने जा रहे हैं। पार्टी ने कहा है कि वो इस फैसले को लेकर लोगों के बीच जाएगी और उन्हें लामबंद करेगी ताकि मोदी अपने फैसले पर फिर से विचार कर सकें।

इससे पहले 2016 में जब एनडीए सरकार की एफडीआई पॉलिसी का विरोध रिजर्व बैंक के गर्वनर रघुराम राजन कर रहे थे तो उनके ये कहने के बाद ही सरकार इस दिशा में कोई कदम उठा पाई थी कि वो गर्वनर के तौर पर दूसरी टर्म नहीं चाहते। 2012 में जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो उन्होंने कहा था कि मनमोहन सिंह एफडीआई के जरिए भारत को अंग्रेज़ों को सौंपने जा रहे हैं। तब वे स्वयं कहते थे कि इससे भारतीयों का व्यापार बर्बाद हो जाएगा आज कहते हैं कि इससे रोज़गार बढ़ेगा। प्रधानमंत्री मोदी की इस दोगली नीति की देशभर में जमकर निंदा हो रही है।

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