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सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने प्रेस कांफ्रेंस करके मुख्य न्यायधीश पर उठाए सवाल

January 13, 2018 08:08 AM

एक अप्रत्याशित घटना जो किसी लोकतंत्र में आज तक नहीं घटी

इंसा$फ के लिए जजों ने मीडिया का सहारा लिया, कहीं निंदा तो कहीं चिंता

दिल्ली: किसी देश के लोकतंत्र के लिए इससे बड़ा खतरा और क्या होगा जब स्वयं न्यायधीशों को ही इंसाफ के लिए जनता के दरबार में जाना पड़े। शुक्रवार जो कुछ हुआ वो भारतीय लोकतंत्र, बल्कि ये कहा जाए कि दुनियां के अधिकांश देशों के लोकतंत्र में कभी न हुआ होगा। सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने एक प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए, सर्वोच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस की कार्यशैली पर सवाल उठाकर, देश की जनता को आगाह किया कि यदि सुप्रीम कोर्ट ही नहीं बचा तो जनतंत्र भी न बचेगा। ऐसा उन्होंने लोकतंत्र के लिए खतरा बनते जा रही न्यायपालिका के कुछ अवांछनीय फैसलों को ध्यान में रखकर कहा। देश की सर्वोच्च अदालत के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा को उन्होंने इससे पहले एक पत्र भी लिखा जिसका कोई असर न होते देख शीर्षस्थ चार जजों ने मीडिया के जरिए अपनी बात जन जन तक पहुंचा दी। ज़ाहिर है देश के लोकतंत्र को जो खतरा दरपेश है वह छोटा नहीं है, ऐसा उनके आरोपों से ज़ाहिर है।

देश की राजधानी दिल्ली में चार जजों जस्टिस जे.चेल्मेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ की ओर से की गई ये प्रेस वार्ता अपनी किस्म की पहली वार्ता है। जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ जजों का गुस्सा वैसे पहली बार फूटा है जबकि ऐसा माहौल उनके खिलाफ पहली बार नहीं बना है। जस्टिस मिश्रा अपने फैसलों को लेकर पहले भी चर्चा में रहे हैं। देश के सिनेमाघरों में फिल्म से पहले राष्ट्रीयगान बजाने का आदेश भी जस्टिस मिश्रा ने ही दिया था, गत सप्ताह सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ ने राष्ट्रगान की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया है। सीधे रुप में जजों ने ज्य़ादा कुछ नहीं कहा अलबत्ता ये ज़रूर कहा कि वे चारों इस बात पर सहमत हैं कि यदि इस संस्थान को नहीं बचाया गया तो इस देश या किसी भी देश में लोकतंत्र जीवित नहीं रह पाएगा। उन्होंने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायपालिका अच्छे लोकतंत्र की निशानी होती है।

प्रेस वार्ता जैसा महत्वपूर्ण एवं अद्वितय कदम चारों जजों ने वैसे ही नहीं उठाया। उन्होंने बताया कि इससे पहले वो शुक्रवार सुबह जस्टिस मिश्रा को मिले थे और अपनी बात उनके सामने रखी लेकिन उसपर उनकी सहमति हासिल नहीं कर सके। उन्होंने कहा कि इसके बाद दूसरा कोई विकल्प बचा ही नहीं, बेहतर लगा कि देश को बताया जाए कि न्यायपालिका की देखभाल की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि सारे प्रयास बेकार हो जाने के बाद ये कदम उठाया गया है। उन्होंने कहा वो नहीं चाहते कि कोई २० साल बाद भी ये कहे कि इन चारों जजों ने अपनी आत्मा बेच दी थी। जब उनसे पूछा गया कि क्या वो चाहते हैं कि चीफ जस्टिस के खिलाफ महाभियोग चलाया जाए तो उनका जवाब था कि ये तो देश को तय करना है। जस्टिस गोगोई जोकि इसी साल जस्टिस मिश्रा की रिटायरमेंट के बाद अक्टूबर  में देश के चीफ जस्टिस बनने जा रहे हैं ने मन को हल्का करते हुए मीडिया से कहा कि ये देश का कर्ज था जो उन्होंने चुकाया है। 

सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने एक प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए, सर्वोच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस की कार्यशैली पर सवाल उठाकर, देश की जनता को आगाह किया कि यदि सुप्रीम कोर्ट ही नहीं बचा तो जनतंत्र भी न बचेगा। 

हालांकि माननीय जजों ने खुलकर उन सभी मामलों का जि़क्र नहीं किया जिन्हें लेकर उन्हें प्रेस कांफ्रेंस करनी पड़ी फिर भी जस्टिस चेल्मेश्वर ने कहा कि इन मामलों में मुख्य न्यायधीश द्वारा कुछ मामलों की सुनवाई अकारण दूसरे जजों को सौंपे जाना भी शामिल है। दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और सुप्रीम कोर्ट के जज रहते समय भी जस्टिस मिश्रा अपने कुछ आदेशों को लेकर चर्चा में रह चुके हैं। सिनेमा में राष्ट्रगान अनिवार्य करने के साथ साथ किसी भी एफआईआर को २४ घंटे के अंदर वेबसाईट पर डालने, आपराधिक मानहानि के प्रावधानों की संवैधानिकता बरकरार रखने जैसा फैसला देने के लिए भी वे चर्चा में रहे। मानहानि वाला फैसला राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल और सुब्रामनियन स्वामी बनाम युनियन मामले में सुनाया गया था जिसमें बेंच ने स्पष्ट किया था अभिव्यक्ति का अधिकार असीमित नहीं है। जस्टिस मिश्रा मुंबई दंगों में याकूब मेनन की फांसी की सज़ा बरकरार रखने वाली पीठ में भी थे। उन्होंने ये फैसला बड़े सवेरे पांच बजे सुनाया था, रात भर चली अदालत के बाद मेमन को फांसी दे दी गई थी। उन्होंने प्रोमोशन मामले में आरक्षण पर रोक लगाई थी।

चार जजों की प्रेस कांफ्रेंस के बाद देश विदेश के मीडिया में तूफान आ गया है। कुछ पुराने जज और सरकार समर्थक कह रहे हैं कि जजों को मीडिया में नहीं जाना चाहिए था जबकि जजों का मानना है कि जब सारी कोशिशें बेकार गईं तो ये कदम उठाना पड़ा। सीनियर वकील प्रशांत भूषण जिनके साथ जस्टिस मिश्रा की एक सुनवाई के दौरान बहस हो गई थी और प्रशांत कोर्ट छोडक़र चले गए थे, ने कहा कि अपनी ताकत का दुरुपयोग करने वाले के खिलाफ आखिर किसी को तो मुंह खोलना ही था। पूर्व वित्तमंत्री एवं भाजपा के वरिष्ट नेता यशवंत सिन्हा ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि वे चारों जजों के साथ परिपक्वता से खड़े हैं जो देश के मुख्य न्यायधीश  को लेकर जनता के बीच गए हैं। सिन्हा ने कहा कि जो लोग चारों जजों की कार्यशैली पर सवाल उठा रहे हैं उन्हें मामले की गंभीरता को समझना चाहिए।

उन्होंने कहा कि माना कि ये प्रेस कांफ्रेंस अप्रत्याशित थी लेकिन जब देश का हित दांव पर हो तो इसे हल्के से नहीं लिया जा सकता। उधर राहुल गांधी ने आशा व्यक्त की कि अब जज लोया की मौत का रहस्य भी खुल सकेगा। अटारनी जनरल केके वेनुगोपाल ने इस बीच कहा है कि इस प्रेस कांफ्रेंस को टाला जा सकता था, ये एक अप्रत्याशित घटना है। पूर्व चीफ जस्टिस आरएम लोढा ने कहा कि न्यायपालिका पर जो दाग लग गया है उसे भरने में समय लगेगा और इसके लिए दीपक मिश्रा को अब अपनी शासन कला दिखानी होगी। पूर्व हाईकोर्ट जज वीजी पाल्शीकर ने इसे न्यायपालिका के इतिहास में एक काला दिन करार दिया है।

 

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