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कांग्रेस-बीजेपी की सराकारों ने 1984 सिख क़त्लेआम के आरोपियों को बचाने का काम किया

January 11, 2018 03:03 PM

साल 1984 में सिखों का कत्लेआम दिल्ली के इतिहास में सबसे काला और दर्दनाक अध्याय है। आज तक कांग्रेस- बीजेपी की सरकारों ने सिख क़त्लेआम के आरोपियों को बचाने का काम किया है। अब बस उम्मीद माननीय सुप्रीम कोर्ट से ही है, जहां से इस क़त्लेआम के पीड़ितों को न्याय मिल सकता है।

पार्टी कार्यालय में आयोजित हुई प्रैस कॉंफ्रैंस में बोलते हुए पार्टी के वरिष्ठ नेता एंव राज्यसभा के नवनिर्वाचित सांसद संजय सिंह ने कहा कि ‘बड़े शर्म की बात है कि लगभग तीस साल तक कांग्रेस और बीजेपी इस नरसंहार के दोषियों को बचाने की पूरी कोशिश करती रही, हम याद दिलाना चाहते हैं कि पहली बार आम आदमी पार्टी की 49 दिन की सरकार में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने निष्पक्ष जांच के लिए एसआईटी का प्रस्ताव दिल्ली के एलजी को भेजा था।

हमारी सरकार जाने के बाद एक साल तक एसआईटी पर कोई पहल नहीं हुई, मई 2014 तक जब तक केंद्र में कांग्रेस सरकार थी तब तक एसआईटी में कोई प्रगति ना होना तो समझ में आता है क्योंकि ये नरसंहार कांग्रेस द्वारा ही प्रयोजित था लेकिन मई 2014 के बाद एसाईटी के प्रति मोदी सरकार के द्वारा अपनाई गई उदासीनता चौंकाने वाली थी, पांच महीने तक कुछ नहीं हुआ और नवम्बर 2014 में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने ये जानने के लिए पहले एक कमेटी गठित की कि इस मामले में क्या एसआईटी की आवश्यकता है या नहीं।

फरवरी 2015 में दिल्ली विधानसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद घबराई मोदी सरकार ने केजरीवाल सरकार के शपथ ग्रहण से एक दिन पहले 13 फरवरी को आनन फ़ानन में एसआईटी का गठन कर दिया ताकि अरविंद केजरीवाल इस मामले में निष्पक्ष जांच ना करा पाएं।

अब माननीय सुप्रीम कोर्ट ने मोदी सरकार की निष्क्रिय एसआईटी की पूरी तरह से पोल खोल दी है क्योंकि मोदी जी की एसआईटी ने पिछले तीन साल से कोई प्रगति नहीं की है।

संजय सिंह ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि ‘मोदी सरकार की एसआईटी ने केवल कांग्रेस नेताओं को बचाने का काम किया है और जो 290 मामलों की जांच मोदी सरकार की एसआईटी कर रही थी उनमें से 190 मामलों को उन्होंने बंद कर दिया है, इसका अर्थ सीधा-सीधा यह है कि ये एसाईटी केवल इसलिए बनाई गई थी कि दिल्ली सरकार एक निष्पक्ष एसाईटी का गठन करके 1984 के दंगों की जांच ना करवा दे जिसमें कांग्रेस नेता सीधे फंस रहे हैं।

आम आदमी पार्टी के नेता एंव राजौरी गार्डन के पूर्व विधायक जरनैल सिंह ने कहा कि ‘हम सुप्रीम कोर्ट से अपील करते हैं कि इन मामलों की जांच सीबीआई या कुछ स्वतंत्र जांच एजेंसी से कराई जाए क्योंकि हमें दिल्ली पुलिस पर कोई भरोसा नहीं है, उसका कारण यह है कि दिल्ली पुलिस सीधे उन हत्याओं में शामिल रही थी लिहाज़ा उनकी जांच संदेह के घेरे में रहेगी।

हमारी अपील है कि सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में ही इन मामलों की जांच और सुनवाई होनी चाहिए जैसा कि गुजरात दंगा मामलों में किया गया था और परिणामस्वरूप जिसमें कुछ लोगों को सज़ा भी हुई थी। सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में होने वाली जांच के लिए अगर दिल्ली में किसी ऑफ़िस, अफ़सर और स्पेशल कोर्ट की ज़रुरत है तो दिल्ली सरकार उसे मुहैय्या कराने के लिए तैयार है। 

संजय सिंह ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि ‘मोदी सरकार की एसआईटी ने केवल कांग्रेस नेताओं को बचाने का काम किया है और जो 290 मामलों की जांच मोदी सरकार की एसआईटी कर रही थी उनमें से 190 मामलों को उन्होंने बंद कर दिया है, इसका अर्थ सीधा-सीधा यह है कि ये एसाईटी केवल इसलिए बनाई गई थी कि दिल्ली सरकार एक निष्पक्ष एसाईटी का गठन करके 1984 के दंगों की जांच ना करवा दे जिसमें कांग्रेस नेता सीधे फंस रहे हैं।

अगर 1984 के सिख कत्लेआम के मामले में कांग्रेस को अपनी भूमिका के संदर्भ में थोड़ी-बहुत भी शर्म आ रही है तो उन्हें सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर को तुरंत पार्टी से बाहर निकालना चाहिए। दिल्ली विधानसभा ने 30 जून, 2015 को ही 1984 के सिख कत्लेआम के खिलाफ एक प्रस्ताव पारित किया था। अब ज़रुरी है कि, संसद भी सांप्रदायिक हिंसा की राजनीति के खिलाफ एक मजबूत संदेश देते हुए इसी तरह का प्रस्ताव पास करे।

एक "सांप्रदायिक और जातीय हिंसा बिल" भी संसद में इस वक्त लंबित है, जिसमें सांप्रदायिक या जातिय हिंसा के दौरान राजनेताओं, पुलिस और प्रशासन की जवाबदेही तय करने के प्रावधान शामिल हैं, वो बिल तत्काल पास होना चाहिए। यदि सरकारी लोग हिंसा को रोकने में विफल रहते हैं, तो उन पर मुकदमा चलना चाहिए और उनपर सख्त सज़ा का प्रावधान भी किया जाना चाहिए।  

 
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