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दिल्ली दंगों की 186फाइलों की फिर से हो जांच-सुप्रीम कोर्ट

January 10, 2018 10:26 PM

विशेष जांच टीम के गठन का आम आदमी पार्टी ने किया स्वागत

आज तक सिर्फ सियासत ही हुई, किसी ने नहीं जाना सिखों का दर्द

दिल्ली :1984 के दंगे यानि सिखों का कत्ल-ए-आम। देश के नाम पर कलंक। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उपजे (इन्हें जानबूझकर पैदा किए गए कहना ज्य़ादा सही है) हालात के चलते हज़ारों सिखों की हत्या करना रोम साम्राज्य में हुए नरसंहार से कम नहीं आंका जाता। पिछले ३३ साल से पीडि़त सिख इस बात की उम्मीद लगाए बैठे हैं कि कोई तो सरकार आएगी जो उनके जख्मों  का दर्द समझते हुए उनका ईलाज़ करेगी लेकिन ऐसा हुआ नहीं। समय समय पर देश की सरकारों ने इस कांड की निंदा तो ज़रूर की लेकिन जो लोग करीब ८००० निरपराध सिखों की हत्या के लिए जिम्मेवार थे उन्हें कोई सज़ा नहीं दी गई। सरकारी आंकड़े कहते हैं कि अकेले दिल्ली में ही ३००० लोग दंगों की भेंट चढ़े। असल संख्या इससे कहीं अधिक है। एक ऐसा प्रधानमंत्री जिसने अपनी माता की हत्या के बाद ये कहा कि, जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती कांपती ही है, असल में दंगों का जनक था।

बुधवार को देश की सर्वोच्च अदालत ने 1984 के दंगा पीडि़त परिवारों के उन 186 मामलों को एक विशेष जांच कमेटी को सौंपने के आदेश दिए हैं जिन्हें पहले सबूतों के अभाव या फिर अकारण बंद कर दिया गया था। जांच कमेटी की सदारत हाईकोर्ट के एक रिटायर्ड जज करेंगे। कमेटी में एक कार्यरत पुलिस अधिकारी और एक सेवानिवृत पुलिस अधिकरी को शामिल किया जाएगा ताकि मामले की हर पहलू से जांच की जा सके। आम आदमी पार्टी ने 186 फाइलों को फिर से खोलने का स्वागत किया है। आम आदमी पार्टी के राजौरी से पूर्व विधायक जरनैल सिंह ने इस बीच एक प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हुए कहा कि दिल्ली पुलिस पर इस तरह की जांच का भरोसा नहीं किया जा सकता क्योंकि ये पुलिस तो स्वयं दंगों में सीधे तौर पर शामिल थी इसलिए सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच करवाना एक उचित कदम है।

बता दें कि कभी वेद मरवाह कमीशन तो कभी जस्टिस रंगनाथ मिश्रा कमीशन, कभी कपूर मित्तल कमेटी तो कभी जैन बैनर्जी कमेटी का गठन किया गया ताकि आरोपियों को सज़ा दी जा सके लेकिन ऐसी किसी भी कमेटी ने सिखों को कभी भी इंसाफ नहीं दिया। ऐसे कमीशनों और कमेटियों की एक लंबी फहरिस्त है। इनमें वीपी सिंह सरकार के समय बनी पट्टी रोशा कमेटी, जैन अग्रवाल कमेटी, आहुजा कमेटी, गुरदियाल सिंह ढिल्लों कमेटी, मदन लाल खुराना मुख्यमंत्री काल में बनी नरूला कमेटी और राज्यसभा में परित जस्टिस जीटी नानावती कमीशन तक को ये जिम्मेवारी सौंपी गई कि वो जैसे भी हो कातिलों को कठघरे में खड़ा करें ताकि सिखों के रिसते जख्मों पर मरहम रखी जा सके, लेकिन ये सब कमीशन और कमेटियां ज्य़ादातर सत्तापक्ष का ही पक्ष पूरा करते नज़र आए। सिखों को न इंसाफ मिलना था और न ही मिला। आज भी जो आवाज़ इंसाफ के लिए उठाई जा रही है, न जाने उसे भी कब दबा दिया जाए।

दरअसल 1984 के सिख दंगों पर आज तक सिर्फ सियासत ही होती आई है। चाहे केंद्र में कांग्रेस सरकार रही हो या फिर भाजपा या कोई और, सभी ने सिर्फ सियासी रोटियां ही सेकी हैं, मगर उन सिखों का दर्द नहीं बांटा जो दंगा पीडि़त हैं। जरनैल सिंह भी पीडि़तों में से एक हैं। मात्र आम आदमी पार्टी ही ऐसी पार्टी है जिसने दिल्ली विधानसभा चुनाव जीतते ही सिख कत्लेआम के खिलाफ़ प्रस्ताव पारित किया था। शायद यही कारण है कि जरनैल सिंह ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित की जाने वाली विशेष जांच टीम का स्वागत किया है।

जरनैल सिंह कहते हैं कि कांग्रेस के कितने ही नेताओं पर दंगा फैलाने के आरोप लगे, गवाहियां हुईं, सबूत भी मिले लेकिन सज़ा किसी को भी नहीं मिली फिर वो चाहे जगदीश टाईटलर हो या फिर कोई और कांग्रेसी। भले ही सांप्रदायिक हिंसा व जातीय ङ्क्षहसा बिल-इस वक्त भी संसद में लंबित है लेकिन ये कब पास होगा और कब राहत मिलेगी, कहा नहीं जा सकता। आम आदमी पार्टी का मानना है कि ये बिल जल्द पास होना चाहिए क्योंकि सांप्रदायिक या जातीय हिंसा के मामले में बिल जब कानून बनेगा तो ये ही राजनेताओं, पुलिस और प्रशासन की जवाबदेही तय करेगा। सिख दंगों पर आज तक जो कार्यवाही हुई वह सिर्फ लीपापोती ही मानी जाएगी, अब तो इतनी अधिक देर हो चुकी है कि इस दौरान बहुत से आरोपी प्राकृतिक मौत भी मर चुके हैं। इस तरह तरसा तरसा कर दिया जाने वाला इंसाफ किस काम का होगा, अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

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