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बहुत कठिन है मोदी के शासन में गलत को गलत कहना

January 08, 2018 02:27 PM

आधार कार्ड को लेकर आईना दिखाया तो पुलिस ही खिलाफ हो गई

कोई भी खरीद सकता है किसी का भी आधार कार्ड, मगर सरकार नहीं मानती

चंडीगढ : मोदी के शाासन में कुछ गिने चुने पत्रकार ही बचे हैं जो सरकारी प्रकोप का भाजन नहीं बनते क्योंकि वे हमेशा सरकार के हर काम का भजन जो करते हैं। एक ऐसी पत्रकार जिसने सरकार को आईना दिखाने की कोशिश की उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज करके न केवल उसे मानसिक रुप में प्रताडि़त किया जा रहा है बल्कि ये संदेश भी देने की कोशिश की जा रही है कि सरकार या इसके बड़े अदारों के खिलाफ लिखने से पहले सोच लिया जाए कि इसका अंजाम क्या हो सकता है। जो भी हो मीडिया भाईचारा अब एकजुट हो गया है और सरकारी तंत्र से लोहा लेने को तैयार है। साथ ही ये बात सभी को जान लेनी चाहिए कि सरकार भले ही लाख दावे करे लेकिन आधार कार्ड का डेटा कोई भी चुरा या पैसे देकर खरीद सकता है।

चंडीगढ़ से प्रकाशित एक बहुभाषी समाचार पत्र की एक पत्रकार ने यूआईडीएआई (युनिक आईडेंटीफिकेशन अथॉरिटी आफ इंडिया) की ओर से हर भारतीय के लिए लाजि़मी करार दिए गए आधार कार्ड की पोल खोल दी है। पत्रकार ने मात्र 500 रुपए देकर एक ऐसे शख्स से करीब एक करोड़ लोगों के आधार कार्डों की जानकारी हासिल की जो कि सरकारी कामकाज पर एक गहरी चोट है। इतना ही नहीं गैर कानूनी धंधे में लगे एक व्यक्ति के जरिए किसी दूसरे का आधार कार्ड ऑन लाइन प्राप्त करके उसका वो प्रिंट भी लिया जिसे दिखाकर बहुत से सरकारी और गैर सरकारी काम किए जा सकते हैं। हालांकि यूआईडीएआई हमेशा से दावा करता आ रहा है कि आधार कार्ड की सारी प्रक्रिया इतनी महफूज़ है कि उसका किसी भी तरह से दुरूपयोग नहीं किया जा सकता लेकिन पत्रकार ने इस दावे की हवा निकालते हुए सरकार को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है।

यहां ये भी ध्यान देने योग्य है कि मोदी सरकार ने आधार कार्ड को आपके बैंक खाते, मोबाईल कनेक्शन, आमदनी कर और यहां तक कि ड्राईविंग लाइसेंस से भी जोडऩे के आदेश दे रखे हैं। इस तरह कहा जा सकता है कि कोई भी व्यक्ति आपकी सारी अंदरूनी जानकारी थोड़े से पैसे खर्च करके घर बैठे हासिल कर सकता है। सरकार ने अंग्रेज़ी अखबार व उसके पत्रकार के खिलाफ  ये कहकर मामला दर्ज किया है कि खबर झूठी है और इसका कोई आधार नहीं है। एफआईआर में उन दो व्य1ितयों के नाम भी हैं जिनके जरिए आधार कार्ड डेटा तक पहुंच की गई। होना तो ये चाहिए था कि सरकार पहले जांच करती, उन कथित एजेंंटों तक पहुंच करती और यदि मामला गल्त होता तो एफआईआर दर्ज करती। लेकिन यहां तो उल्टा हो रहा है। पत्रकारिता को दबाया जा रहा है, अभिव्य1ित की स्वतंत्रता पर गहरी चोट की जा रही है और सरकार अपनी जि़6मेवारी से भाग भी रही है।

जब कभी किसी को उसके मोबाईल पर कोई विज्ञापन भरा संदेश आता है तो वह व्यक्ति हैरान रह जाता है कि विज्ञापनदाता के पास उसका कांटेक्ट नंबर पहुंच कैसे गया। अब इसमें कोई संदेह नहीं रह गया कि ये जानकारी ठीक वैसे ही लीक हो रही है जैसा कि पत्रकार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है। सूत्रों के अनुसार कांटेक्ट नंबरों की जानकारी के आदान प्रदान का एक बहुत बड़ा व्यापार पनप रहा है। कुछ ऐजेंट यूआईडीएआई की वैबसाइट में सेंध लगाकर एक बार जानकारी जुटा लेते हैं फिर वो उसे आगे लगातार बेचते रहते हैं। इस तरह वे लोग घर बैठे ही करोड़ों रुपया कमा लेते हैं जबकि आम जनता फिजूल में अपने मोबाईल पर वो सब देखती और पढ़ती है जिसकी उसे ज़रूरत भी नहीं होती।

यहां ये भी ध्यान देने योग्य है कि यूआईडीएआई के डिप्टी डायरेक्टर बीएम पटनायक ने जो एफआईआर दर्ज करवाई है उसे ऐसा करने का न तो अधिकार था और न ही उसके पास पत्रकार के खिलाफ कोई माकूल आधार ही है। यूआईडीएआई प्राधिकरण की नियमावली कहती है कि एफआईआर दर्ज करना कानूनन गल्त है। क्योंकि  पत्रकार ने पैसे देकर न सिर्फ लॉग इन आईडी और पासवर्ड खरीदा बल्कि आधार कार्ड प्रिंट भी निकलवा लिया, इस बात के लिए उसकी तारीफ करनी चाहिए कि उसने यूआईडीएआई की आंखें खोल दीं, उल्टा उसे ये कहा जा रहा है कि उसने ऐसा दुस्साहस कैसे किया। पटनायक ने एफआईआर में आरोप लगाया है कि पत्रकार ने अवैध और गैरकानूनी ढंग से एक अज्ञात व्यक्ति की सेवाएं खरीदीं जो कि अपने आप में अपराध है।

इस दौरान पटनायक के इस कदम की चहुं ओर निंदा हो रही है। देश भर के पत्रकार भाईचारे में आक्रोश फैल गया है। बहुत से प्रेस क्लब  और एडीटर्स गिल्ड तक ने यूआईडीएआई की इस बात के लिए निंदा की है कि जिस काम को उन्हें एक आई ओपनर की तरह लेना चाहिए था उसे गैरकानूनी बताकर पत्रकारिता के अधिकारों को दबाने की कोशिश की जा रही है। सोशल मीडिया पर यूआईडीएआई की कार्यर्शली पर ज़बरदस्त सवाल उठाए जा रहे हैं। एडिटर्स गिल्ड ने तो एफआईआर के कदम को प्रेस की आज़ादी पर सीधा हमला करार दिया है। सोमवार को इसे लेकर देश भर में बहुत से स्थानों पर पत्रकारों ने एफआईआर के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किए हैं। दूसरी ओर यूआईडीएआई ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी करके कहा है कि ऐसा आभास करवाया जा रहा है कि प्राधिकरण उन लोगों के खिलाफ  है जो उन्हें किसी संभावित खतरे के प्रति आगाह कर रहे हैं जबकि वास्तव में ऐसा नहीं है।

सवाल ये भी है कि भले ही पत्रकार ने लॉगइन और पासवर्ड किसी अज्ञात से पैसे देकर खरीदे, लेकिन यूआईडीएआई को ये तो स्वीकार कर ही लेना चाहिए कि ऐसा करना संभव है। और यदि ये संभव है तो ये कहना सरासर गल्त है कि आधार कार्ड की तमाम जानकारी सुरक्षित है। हैरानी तो इस बात की है कि यूआईडीएआई अभी भी ये मानने को तैयार नहीं कि डेटा असुरक्षित है। यदि ऐसा ही रहा तो वो दिन दूर नहीं जब देश के हर छोटे बड़े व्यक्ति की तमाम जानकारी उन लोगों के हाथ में होगी जो हमेशाा गैरकानूनी और समाजविरोधी गतिविधियों में लगे रहते हैं। यही सब बताने के लिए जालंधर के एक छोटे से व्यापारी भारत भूषण गुप्ता ने यूआईडीएआई के टोल फ्री नंबर पर संपर्क करके किसी अधिकारी से बात करने की इच्छा व्यक्त  की थी लेकिन जब ये संभव न हुआ तो उसने मीडिया की ओर रुख किया, परिणाम सामने है। 

जब कभी किसी को उसके मोबाईल पर कोई विज्ञापन भरा संदेश आता है तो वह व्यक्ति हैरान रह जाता है कि विज्ञापनदाता के पास उसका कांटेक्ट नंबर पहुंच कैसे गया। अब इसमें कोई संदेह नहीं रह गया कि ये जानकारी ठीक वैसे ही लीक हो रही है जैसा कि पत्रकार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है।

बता दें कि अखबार के संपादक को भेजे पत्र में यूआईडीएआई ने यहां तक पूछा कि क्या  उनका पत्रकार बता सकता है कि जिन आधारकार्डों तक उसने पहुंच की वो किनके थे और ये भी कि क्या पत्रकार आधार कार्ड में दर्ज उंगलियों के प्रिंट या अन्य जानकारी मुहैया करवा सकता है ? ये एक बहुत ही विचित्र बात है कि जो काम यूआईडीएआई को स्वयं करना चाहिए अर्थात जो जांच उन्हें स्वयं करनी चाहएि उसके लिए अखबार के संपादक को कहा जा रहा है। जिसने देश के हित में खबर लिखी उसके खिलाफ आईपीसी की धारा ४१९, ४२०, ४६८, ४७१ और आईटी की धारा ६६ के अतिरिक्त आधार कार्ड एक्ट  की धारा ३६/३७ के तहत मामला दर्ज कर लिया गया। इससे पहले भी जब किसी ने आधार कार्ड की जानकारी को असुरक्षित बताने की कोशिश की तो उसके खिलाफ कारवाई ही की गई, ऐसे में अब कौन देशभक्त आगे आएगा जो सरकार को आईना दिखाने की हिम्मत कर सके।

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