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बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के आड़े आ रहे हैं उपराज्यपाल के आदेश

January 06, 2018 11:35 PM

सिर्फ विरोधी दलों से ही नहीं एलजी से भी जूझना पड़ता है सरकार को

आपातकाल में जेब में आय का प्रमाण पत्र लेकर नहीं घूमता कोई

दिल्ली : आम आदमी को राहत देने के लिए आम आदमी पार्टी की स्वास्थ्य योजना की राह में जिस तरह से विघ्न डाला जा रहा है उससे लगता नहीं है कि एलजी अनिल बैजल कोई सही संदेश दे रहे हैं। चिकित्सा सुविधा आमजन के घर द्वार पहुंचाने की मुख्यमंत्री केजरीवाल की महत्वपूर्ण योजना को उपराज्यपाल महोदय ने ये कहकर रोक लिया है कि सरकार की स्वास्थय योजना का लाभ पाने के लिए हर मरीज़ को अपना आय प्रमाणपत्र देना होगा। ये बात आम आदमी की समझ से परे है कि आपातकाल में अस्पताल आने से पहले वे अपनी आय का प्रमाणपत्र इतनी जल्दी कहां से लाएं। इसे लेकर स्वयं दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन भी एलजी साहिब से इतराज़ जता चुके हैं कि ये संभव नहीं कि हर व्यक्ति चिकित्सा सुविधा लेने से पहले इंकम सर्टिफिकेट दे दे। इस तरह उपराज्यपाल के आदेश के चलते जन हितैषी एक और योजना अधर में लटकती नज़र आ रही है।

इसे एक विडंबना ही कहा जाएगा कि केजरीवाल सरकार जब भी लोकहित में कोई फैसला लेती है तो उपराज्यपाल उसे लागू ही नहीं होने देते। इससे पहले एलजी नजीब जंग के समय में भी केजरीवाल सरकार का टकराव सुर्खियों में रहा है। अब उपराज्यपाल अनिल बैजल भी अपने पूर्ववर्ती के कदम चिन्होंने पर चलते नज़र आ रहे हैं। ऐसा दूसरी बार होने जा रहा है कि अनिल बैजल और अरविंद केजरीवाल के बीच सेवा के नाम पर टकराव हो रहा है। स्वास्थ्य सुविधा पाने के लिए यदि आम आदमी को इतनी लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा, जितना कि एलजी साहिब चाहते हैं, तो ज़ाहिर है इस का लाभ ले पाना आमजन के लिए टेढ़ी खीर साबित होगा। यही कारण है कि स्वास्थय मंत्री कहते हैं कि मुख्यमंत्री से सलाह मशविरा किए बगैर इस तरह के मापदंड तय करने का सीधा सा मतलब है कि योजना गई ठंडे बस्ते में।

बता दें कि दिल्ली सरकार का अस्पताल हो या फिर केंद्र सरकार का, दोनों में अकसर भीड़ रहती है। ये भीड़ कई बार स्थानीय लोगों की कम और बाहर से आए लोगों की अधिक होती है। सरकारी लाभ न मिल पाने के कारण मरीज़ निजि अस्पतालों की ओर भागते हैं। अब यदि एलजी साहिब के आदेश पर पालन होता है तो ज़ाहिर है इसका लाभ भी निजी अस्पतालों को ही मिलेगा। केजरीवाल सरकार की -स्वास्थ्य सेवा आपके घर द्वार-पर गौर करें तो ये सरकार का निजि अस्पतालों के साथ इस तरह का समझौता है कि यदि सरकारी अस्पताल में वांछित सुविधा नहीं मिल रही तो मरीज़ सरकार के पैनल पर दर्ज अस्पतालों में से कहीं भी जाकर ईलाज़ करवा सकेगा।

बात यहीं खत्म नहीं होती। सरकार ने दो कदम आगे जाकर लैबोरेटरी टैस्ट के लिए भी रास्ता साफ कर दिया है। कोई टैस्ट यदि सरकारी अस्पताल में नहीं हो पा रहा तो पैनल में दर्ज  67 लेब्स में से किसी में भी टैस्ट करवाया जा सकता है। इस के अतिरिक्त यदि मरीज को आप्रेशन की आवशकता है तो वह सरकार के साथ जुड़े ४४ निजि अस्पतालों में से किसी में भी सर्जरी करवा सकता है। $खास बात ये कि सरकार मरीज़ पर आने वाले सारे खर्च को स्वयं वहन करेगी। यदि यहां भी किसी मरीज़ को सर्जरी से पहले अपनी आय का प्रमाण पत्र देना पड़े तो इसके लिए होने वाली देरी के लिए कौन जिम्मेवार होगा, ज़ाहिर है एलजी महोदय। 

 सरकार ने दो कदम आगे जाकर लैबोरेटरी टैस्ट के लिए भी रास्ता साफ कर दिया है। कोई टैस्ट यदि सरकारी अस्पताल में नहीं हो पा रहा तो पैनल में दर्ज  67 लेब्स में से किसी में भी टैस्ट करवाया जा सकता है।

दरअसल सरकारों का गठन तो इसी लिए किया जाता है कि वो आम आदमी के हितों की रक्षा करे, अब यदि एक सरकार मरीज़ का ईलाज करवाने को राज़ी है तो उपराज्यपाल का उसमें अड़चन खड़ी करना समझ से परे है। बात ज्य़ादा पुरानी नहीं है जब दिल्ली के मैक्स अस्पताल का लाइसेंस केजरीवाल सरकार ने केवल इसलिए रद्द कर दिया था कि अस्पताल ने एक जीवित बच्चे को मृत घोषित कर दिया था। सरकार बता देना चाहती थी कि अस्पताल में लाइपरवाही बर्दाशत नहीं होगी। यदि उपराज्यपाल जैसी हस्ती ही मरीज़ के आड़े आए तो फिर मरीज़ कहां जाएं। उपराज्यपाल चाहते हैं कि लोग अपनी आर्थिक हैसियत के अनुसार ईलाज़ करवाएं।

दूसरी ओर सरकार का मत है कि ईलाज़ हर किसी का होना चाहिए, आर्थिक स्थिति बाद में देखी जाएगी। गरीब मरीज़ वैसे भी सरकारी अस्पतालों का ही रुख करते हैं और सरकारी अस्पतालों की स्थिति किसी से छुपी नहीं है। सरकार पहले ही मोहल्ला क्लीनिक की दशा सुधारने में लगी है। स्वास्थय मंत्री ठीक ही कहते हैं कि यदि एलजी साहिब के आदेश पर अमल आरंभ हो गया तो ज़ाहिर है न केवल स्वास्थय सेवाओं की 1वालिटी पर ही असर पड़ेगा बल्कि जो मोहल्ला क्लीनिक अच्छे से चल रहे हैं उनपर भी विपरीत असर पड़ेगा। सरकार को सत्ता में लाने वाली जनता राज्यपाल के इस फैसले से हैरान है कि वे अनावश्यक कागजात के बहाने सरकार की नीति को फेल क्यों करना चाहते हैं। उम्मीद है राज्यपाल आम जनता की अवाज़ ज़रूर सुनेंगे।

 

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