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दिल्ली में ‘प्रदूषण’ और एल.जी. बने दमघोंटू

November 16, 2017 10:55 PM
अनिल बैजल LG दिल्ली

अचानक गैस चैम्बर का रूप धरने वाली दिल्ली का धुंआ, एका-एक ‘30,000’ लोगों को मौत की नींद सुलाने की चेतावनी देने लगता है. ‘एम्स के निदेशक के बयान के मुताबिक’ यहां लोगों का जीवन बेहद खतरे में है.
घर से बाहर निकलने वाली महिलाएं असुरक्षित हैं। यहां ढेड साल की मासूम से गैंग रेप होता है तो पीडित बच्ची और उसके परिजनों को इंसाफ नहीं बल्कि असहनीय पीड़ा सहनी पड़ती है। और तब उसे एहसास होता है राजनीतिक शक्तियों के बीच पिसती दिल्ली का.
संभवतयः शायद ही कोई दिल्ली वासी हो जिसे अधिकारों के भंवर में फंसी दिल्ली में अपनी समस्याओं का सहज समाधान मिल पाता हो।
जरा सोचिए जहां एक ओर हरियाणा पंजाब के किसानों द्वारा जलाई जाने वाली ‘पराली’ दिल्ली का दम घोटने लगती है ठीक उसी भांति केन्द्र सरकार के माध्यम से एल.जी. दिल्ली सरकार के रूटीन कार्यो में दखल देकर सरकार का दम घोंटने के लिए हर वक्त प्रयासरत रहते हैं।
चुनी हुई सरकार के मुख्यमंत्री को यहां एक चपरासी की नियुक्ति तक का अधिकार नहीं है, जनता के विकास की हर योजना पर एल.जी. नाम का रोड़़ा अटका दिया जाता है, दिल्ली में बेहतर होती चिकित्सा सेवाएं व शिक्षा के स्तर के कारण विश्व भर में भारत का नाम रोशन होता है.
विश्व बैंक की नवंबर में जारी रिपोर्ट में कारोबारी कामकाज की आसानी को लेकर भारत में सुधार का श्रेय दिल्ली में आम आदमी पार्टी सरकार को दिया गया है।
किंतु यहां हैरतअंगेज है कि स्वयं संविधान के तहत एवं सवैंधानिक तरीके से चुने हुए मुख्यमंत्री और जनता द्वारा निर्वाचित पूरी की पूरी सरकार को जनता के छोटे-छोटे कामों के लिए एल.जी. पर निर्भर रहने को विवश किया जा रहा है।

ताजा मामला देखिए कि स्वयं दिल्ली प्रदेश की महिला आयोग की अध्यक्ष को एक डेढ़ साल की बच्ची से हुए गैंग रेप के उपंरात न्याय के लिए सड़क पर संघर्ष करना पड़ता है, वह केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह के घर के बाहर धरने पर बैठ बलात्कारियों के बढ़ते हौंसलों की चिंता देश से साझा करती है, कहती हैं कि बलात्कारियों को 6 महीने के भीतर फांसी की सज़ा का प्रावधान कीजिए। किंतु उनकी बेहद संवेदनशील मांग को पुलिसिया बर्वरता के हवाले कर दिया जाता है। 


ताजा मामला देखिए कि स्वयं दिल्ली प्रदेश की महिला आयोग की अध्यक्ष को एक डेढ़ साल की बच्ची से हुए गैंग रेप के उपंरात न्याय के लिए सड़क पर संघर्ष करना पड़ता है, वह केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह के घर के बाहर धरने पर बैठ बलात्कारियों के बढ़ते हौंसलों की चिंता देश से साझा करती है, कहती हैं कि बलात्कारियों को 6 महीने के भीतर फांसी की सज़ा का प्रावधान कीजिए। किंतु उनकी बेहद संवेदनशील मांग को पुलिसिया बर्वरता के हवाले कर दिया जाता है।
चारों ओर से असुरक्षित दिल्ली में सुरक्षा बन्दोबस्तों के तहत 1 लाख 40,000 सी.सी.टीवी कैमरे लगवाने का टेंडर दिल्ली सरकार ने कल ही जारी किया है किन्तु, नियमों का हवाला देकर एल.जी. कब इस पर भी रोक लगा दें और कानूनी प्रावधानों का हवाला दे दें यह डर अब सरकार में ही नहीं जनता में भी बना रहने लगा है।
माननीय सर्वोच्च न्यायालय दिल्ली में अधिकारों की इस लड़ाई पर लगातार सुनवाई कर रहा है, किन्तु फिलवक्त सत्ता, सियासत, कानून, व्यवस्था यहां सिर्फ आम आदमी का टैक्स के रूप में लहू निचोड़़ने की मशीन मात्र बनकर रह गई है, दिल्ली सरकार के पास समस्या सुलझाने का अधिकार नहीं है और केन्द्र के पास काम करने की नीयत की कमी है. दिल्ली ने बदलाव के लिए अढ़ाई साल पहले आम आदमी पार्टी को चुना किन्तु केन्द्र ने बदलाव की चाहत लिए उडान भरने निकले इन परिंदों को व्यवस्था एंव विधान के नाम पर कैद कर लिया, फिलहाल दिल्ली का भविष्य सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर निर्भर है, दिल्ली के लोग आम आदमी पार्टी के विकास के माॅडल, विकास की गति, और विकास के प्रति उनकी सोच को भली भांति जांच-परखने के उपरांत इस बात पर पक्का यकीन कर चुके हैं कि केन्द्र दिल्ली को फ्री हैण्ड दे तो दिल्ली में विकास की रफ्तार कई गुना बढ़ा कर आम आदमी पार्टी दिल्ली का काया कल्प करने में सक्षम है।
जानकार कहते हैं कि दिल्ली सरकार विकास तो खूब कर रही है किंतु हर छोटी-छोटी बात के लिए उसे जो संघर्ष करना पड़ रहा है उससे काबिल सरकार की ऊर्जा फ़जूल के कामों में अधिक खर्च हो रही है। दिल्ली जानती है कि उसने सियासतदानों से पंगा लेकर सत्ता अपने हाथों लेने का जोखिम उठाया है। सत्ता के लुटेरे राहें तो मुश्किल करेंगे ही।

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 उपराज्यपाल कार्यालय के माध्यम से आम आदमी पार्टी की सरकार की हर योजना राजनीतिक कारणों से रुकवा दी जाती है

पैसा ख़र्च करने में दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार को ना तो कोई गुरेज है और ना ही परेशानी, दिल्ली सरकार जनहित से जुड़ी हर मद में पैसा ख़र्च करने के लिए योजनाओं बनाती हैं लेकिन उपराज्यपाल कार्यालय के माध्यम से आम आदमी पार्टी की सरकार की हर योजना राजनीतिक कारणों से रुकवा दी जाती है। 

पार्टी कार्यालय में आयोजित हुई प्रैस कॉंफ्रेंस में बोलते हुए पार्टी के दिल्ली प्रदेश के मुख्य प्रवक्ता सौरभ भारद्वाज ने कहा कि 'कुछ मीडिया संस्थान इस तरह की ख़बर चला रहे हैं कि दिल्ली सरकार के पास पर्यावरण टैक्स के तौर पर जो पैसा आया है उसे सरकार की तरफ़ से खर्च नहीं किया गया है, हम बताना चाहेंगे कि दिल्ली आम आदमी पार्टी की सरकार सभी मदों में पैसा ख़र्च करती है और योजनाएं तैयार करती है लेकिन हमारे हर काम को राजनीतिक कारणों की वजह से उपराज्यपाल कार्यालय के द्वारा रुकवा दिया जाता है। 

उदाहरण के तौर पर अगर हम पर्यावरण को बचाने के लिए उद्येश्य से पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा देना चाहते हैं और नई बसों की ख़रीद करते हैं तो उसके लिए दिल्ली सरकार के पास उन बसों को खड़ा करने के लिए ज़मीन नहीं है। ज़मीन के लिए दिल्ली आप सरकार पूरी तरह से केंद्र सरकार शासित डीडीए और उपराज्यपाल पर निर्भर है। दिल्ली की आप सरकार ने नए बस डिपो के लिए डीडीए को 90 करोड़ रुपए की पेमेंट भी कर दी है लेकिन डीडीए ने आजतक ज़मीन अलॉट नहीं की है। हम पैसा ख़र्च करने की कोशिश भी करते हैं तो उन कार्यों को राजनीतिक कारणों की वजह से रुकवा दिया जाता है।

प्रशासन से जुड़ी इन्हीं जटिलताओं के मुद्दे पर केंद्र सरकार और दिल्ली की चुनी हुई सरकार की शक्तियों को लेकर इस वक्त मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है और हम उम्मीद करते हैं कि दिल्ली में लोकतंत्र की जीत होगी और जनता की सरकार जनता के लिए काम कर पाएगी।

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