Friday, November 24, 2017
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अल्का के ‘सैनेटरी पैड्स’ और भक्तों की ‘गाय’

November 14, 2017 03:27 PM

गुलामी, अत्याचार, गाय, विद्रोह, आंदोलन, क्रांति, वीरांगना, संग्राम और आज़ादी यह वह नौ शब्द हैं जो अपने भीतर, 1857 से लेकर 1947 तक का हमारे क्रांति वीरों द्वारा देश में लड़ा गया आजादी का आंदोलन समेटे हुए है। संयोग देखिए कि अन्ना हज़ारे की अगुवाई में इस देश में शुरू हुआ भ्रष्टाचार विरोधी यह आंदोलन भी इन्हीं नौ शब्दों के इर्द-गिर्द घूम रहा है। इस नौ शब्दों की प्रासंगिकता का भान मुझे आज हो रहा है। मगर यह नौ शब्द किसी संदर्भ में आज से 30 वर्ष पूर्व हिमालय के पुरोला की कंदराओं में रहने वाले एक राष्ट्र चिंतक संत पुरूषोत्तम अवधूता नंद आचार्य ने मुझे एक सूत्र में पिरोकर कहे थे।

‘पहले लड़े थे गोरों से अब लड़ेंगे चोरों से’ तो मेरे ज़हन में यह नौ शब्द मंत्र जाप की किसी माला की भांति स्वतः फिरने लगते। इस वर्तमान संघर्ष से उस स्वतंत्रता आंदोलन का मिलान करता तो ‘दो’ शब्दों को सदा अनुपस्थित पाता,  वह थे ‘वीरांगना’ और ‘गाय’. कल जनसत्ता नामक एक अखबार में प्रकाशित एक समाचार को फ़ॉलो करते हुए ट्विटर पर पहुंचा और ट्विटर पर छिड़े संग्राम में घिरी एक 

पुरूषोत्तम आचार्य से मुलाकात के 25 वर्ष उपरांत वर्ष 2013 में अन्ना आंदोलन से उपजी आम आदमी पार्टी के मुखिया व आंदोलन के प्रमुख रणनीतिकार अरविंद केजरीवाल के आह्वाहन पर जब मैं हज़ारों आंदोलनकारियों के साथ इस अनुष्ठान में शामिल हुआ तो स्वतः स्मृति कोष में दबे वह शब्द उभर कर वर्तमान में खुद का अस्तित्व तलाशने लगे। अरविंद जब-जब अपने संबोधन में काले अंग्रेजों द्वारा देश को लूटने व हमारे नेताओं के हाथों अदानी-अंबानी को बेचने की बात करते और जनता जोश में गगनचुम्बी नारे लगाने लगती कि ‘पहले लड़े थे गोरों से अब लड़ेंगे चोरों से’ तो मेरे ज़हन में यह नौ शब्द मंत्र जाप की किसी माला की भांति स्वतः फिरने लगते। इस वर्तमान संघर्ष से उस स्वतंत्रता आंदोलन का मिलान करता तो ‘दो’ शब्दों को सदा अनुपस्थित पाता,  वह थे ‘वीरांगना’ और ‘गाय’. कल जनसत्ता नामक एक अखबार में प्रकाशित एक समाचार को फ़ॉलो करते हुए ट्विटर पर पहुंचा और ट्विटर पर छिड़े संग्राम में घिरी एक वीरांगना ने मुझे यह लेख लिखने के लिए विवश कर दिया। अल्का ने तीन दिन पहले जीएसटी पर कटाक्ष करता एक ट्विट किया था. लिखा था ‘गाय मां है, पर पीरियड्स नहीं आते, आते भक्त लोग, मोदी जी, जेटली जी को कह कर सैनेटरी पैड्स को जीएसटी से बाहर करवा देते, - पुरूष प्रधान सोच‘. यही वह ट्विट है जिस पर बवाल हुआ। 

जी हां, मेरे राष्ट्र की परंपरा ने मुझे मातृ शक्ति को देवी स्वरूपा मानने की तहज़ीब दी है,  तो यहां मैं अल्का लांबा को वीरांगना तो कह ही सकता हूं,  और आप भी अल्का के ट्विटर हैंडल को जरूर खंगालिए आपको भी काले अंग्रेजों से अद्म्य साहस से लड़ती अल्का लांबा एक वीरांगना ही लगेंगी। खैर जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि मगर भ्रष्टाचार के खिलाफ इस आंदोलन में ‘गाय’ और ‘वीरांगना’ की मेरी तलाश पूरी हुई। इन नौ शब्दों में आठ अपना दायित्व निभा चुके दिखाई देते हैं जबकि नौवां आजादी, यानि काले अंग्रेजों से आजादी अभी बाकी है। आजादी की इस दूसरी लड़ाई में क्रांतिकारी आज भी अपना फर्ज बखूबी निभा रहे हैं और शब्दों को भी मैने क्रांति सुलगाते अपना फर्ज निभाते देखा है। आज अल्का लांबा ने सैनेटरी पैड्स के बहाने इस क्रांति को हवा दी। मामला महिलाओं से जुड़ा केवल उनकी सेहत व आर्थिकी पर प्रहार का नहीं है,  बल्कि इसके गहरे असर को स्वच्छ भारत मिशन की नींव हिला देने वाला, असंवेदनशीलता की पराकाष्ठा से जुड़ा कहा जाए तो अतिशयोक्ति न होगी। अल्का लांबा ने इस गंभीर मसले पर,  पूरी गंभीरता से उसी शक्ति के साथ कटाक्ष किया जिस शक्ति से कटाक्ष की आवश्यकता थी,  तो गोरे अंग्रेजों की काली औलादें तिलमिला उठी। हालांकि इस वीरंगना के शब्द लक्ष्मीबाई की तलवार की भांति पैने हैं किन्तु मातृ शक्ति के सैनिटरी पैड्स से पलने वाले अंग्रेजों की नाज़ायज औलादों के बहरे कान साधारण शब्द सुन भी तो नहीं पाते। खैर अल्का की निर्भयता उन्हें लोगों की निगाहों में वीरांगना के रूप में स्थापित कर गई और मुझे मिले आजादी की इस दूसरी लड़ाई में पूर्णत्व के संकेत।

 

पूरा लेख पढ़ें ‘आप की क्रांति’ के अगले अंक में..... 

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