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एक बार फिर ऑक्सिजन की कमी से 49 बच्चों की मौत, जांच होगी

September 04, 2017 11:19 PM

पहले गोरखपुर और अब फार्रुखाबाद में घटी शर्मनाक घटना

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 उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में एक माह में करीब 309 बच्चों की ऑक्सिजन की कमी के चलते हुई मौतों की खबर की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि अब फार्रुखाबाद में एक माह में 49 बच्चों की भी ऑक्सिजन की कमी के चलते मौत होने की सूचना आ गई है। मामला भले ही बहुत संजीदा है लेकिन प्रदेश के मुख्यमंत्री पर इसका कोई असर नज़र नहीं आ रहा। महज़ कागजी कार्यवाई करते हुए लीपापोती करके संबंधित अधिकारियों को आंशिक सज़ा दी जा रही है। सुधार के नाम पर शून्य कदम उठाए जा रहे हैं और फिर से अस्पतालों को उसी स्थिति में छोड़ा जा रहा है ताकि वे फिर से बच्चों की बलि ले सकें। बेहतर होता कि स्वास्थय सेवाओं के लिए दिल्ली मॉडल ही अपना लिया होता तो कम से कम ये हालत तो न होते। राज्य सरकार ने जांच के आदेश दे दिए हैं।

अब क्या होगा, वही जांच, वही एक दूसरे पर दोषारोपण और ज्य़ादा हुआ तो राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ एक बार फिर से कह देंगे कि बच्चों का पालन पोषण मांबाप की जिम्मेवारी है सरकार की नहीं। किंतु ये खबर तो जांच के बाद ही सामने आई है। फार्रुखाबाद के राम मनोहर लोहिया राजकीय चिकित्सालय में गत 20 जुलाई से गत 20 अगस्त के बीच 49 बच्चों की मौत हो गई थी। जि़लाधिकारी रविंद्र कुमार ने जि़ला चिकित्साधिकारी को जांच करने को कहा। उनकी जांच से असंतुष्ट जि़लाधिकारी ने एक एसडीएम को सारे मामले की गंभीरता से जांच के आदेश दिए। एसडीएम ने पाया कि एक माह में 19 बच्चे तो जन्म लेते ही प्राण त्याग गए और बाकी बच्चे ऑक्सिजन की कमी का शिकार हुए। ये रिपोर्ट आते ही एसडीएम ने जि़ला चिकित्साधिकारी, अस्पताल के मुख्य चिकित्साधिकारी और महिला चिकित्साधिकारी सहित कई डाक्टरों पर आईपीसी की धारा 304,176 और 188 के तहत आपराधिक मामले दर्ज करवा दिए।

जि़लाधिकारी ने मीडिया को इस बीच बताया कि एसडीएम जैनेंद्र जैन की रिपोर्ट के मुताबिक 30 में से अधिकतर बच्चों की मौत का कारण पैरीनेटल एस्फिसिया बताया जाता है। जांच के मुताबिक मृत शिशुओं के परिजनों ने जांच अधिकारी को फोन करके बताया कि डाक्टरों ने बहुत ज्य़ादा लापराही की और बच्चों को ऑक्सिजन ही नहीं दी। इसके अतिरिक्त कोई दवा भी नहीं दी गई जो उस समय लाजि़मी होती है। इससे सिद्ध हो गया कि बच्चों की मौत का कारण पर्याप्त मात्रा में ऑक्सिजन का न मिलना है। उधर राज्य के डायरेक्टर जनरल ऑफ हैल्थ का बयान आया है कि पैरीनेटल एस्फिसिया के कई कारण हो सकते हैं और प्लेसेंटल रक्त प्रवाह में रुकावट आना इनमें से एक है। उन्होंने मीडिया से कहा कि वास्तविकता का पता लगाने के लिए एक राज्य स्तरीय टेक्निकल टीम भेजी जाएगी।

ज़ाहिर है कि अब जांच फिर से कागजों में गुम हो जाएगी और इस धरती पर आने वाले बच्चे इन अस्पतालों में फिर से लापरवाह सरकारी तंत्र के रहमो करम पर छोड़ दिए जाएंगे। बात ज्य़ादा पुरानी नहीं, महज एक सप्ताह पूर्व गोरखपुर में बच्चों की मौत का मामला प्रकाश में आते ही राज्य के मुख्यमंत्री योगी ने एक शर्मनाक बयान में कहा था कि लोग समझते हैं कि बच्चों का पालण पोषण करना सरकार की जिम्मेवारी है। योगी अब बताएं कि क्या सरकार कोई जिम्मेवारी एंठ रही है, उनके राज्य में बच्चे तो आज भी राम भरोसे ही जन्म ले रहे हैं। राज्य के दो सुपर स्पेशिलिटी वाले अस्पतालों से तो खबर आ गई है, जो दूसरे अस्पतालों में घटा होगा उसकी तो सूचना भी नहीं आई अभी तक। 

उधर राजस्थान के बांसबाड़ा में भी 86 बच्चों की मौत के बावजूद अभी तक सेंट्रल ऑक्सिजन सिस्टम चालू नहीं हो सका है। मीडिया में आ रहे समाचार बता रहे हैं कि राज्य की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने रिमोट कंट्रोल से उस शिशु अस्पताल के सेंट्रल ऑक्सिजन सिस्टम का उदघाट्न किया था जिस भवन का 16 करोड़ की लागत से निर्माण किया गया है।

उधर राजस्थान के बांसबाड़ा में भी 86 बच्चों की मौत के बावजूद अभी तक सेंट्रल ऑक्सिजन सिस्टम चालू नहीं हो सका है। मीडिया में आ रहे समाचार बता रहे हैं कि राज्य की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने रिमोट कंट्रोल से उस शिशु अस्पताल के सेंट्रल ऑक्सिजन सिस्टम का उदघाट्न किया था जिस भवन का 16 करोड़ की लागत से निर्माण किया गया है। बच्चों की मौतों की खबरें निरंतर आ रही हैं लेकिन लीकेज के चलते सिस्टम फिर भी चालू नहीं किया गया। लगता है राज्य सरकार और बच्चों की बलि लेना चाहती है। कहा तो ये जाता है कि राजस्थान अपने कुल बजट का 5.6 फीसदी स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करता है जोकि देश भर में दिल्ली के बाद दूसरे नंबर पर है लेकिन परिणाम तो फिर भी शून्य है।

जैसा कि इंडियन मैडीकल एसोसिएशन के प्रधान डॉ. केके अग्रवाल ने भी कहा है, ये घटनाएं तो गल्तियों के ढेर का संकेत मात्र हैं,  असलियत तो ये है कि मामला इससे भी कहीं अधिक संगीन है। ऐसी बहुत सी घटनाएं और भी होती हैं जो प्रकाश में ही नहीं आती। पांच साल से कम उम्र के तीन लाख से अधिक बच्चे हर साल केवल डॉयरिया के कारण ही दम तोड़ देते हैं, राज्य सरकारों को जो उपाय करने होते हैं वे होते ही नहीं, ज़ाहिर है ये आंकड़े भविष्य में बढ़ेंगे ही। ये भी तब है जबकि डाक्टर सहूलत होने या न होने की सूरत में भी अपनी सेवाएं दे रहे हैं। फार्रुखाबाद की इस घटना से पहले जब गोरखपुर के बाबा राघव दास मैडीकल कॉलेज में एक सप्ताह में सैकड़ों बच्चे मरे थे तो उम्मीद की गई थी कि राज्य सरकार युद्धस्तर पर कोई कार्यवाई अमल में लाएगी। अब जो कुछ सामने आ रहा है उससे नहीं लगता कि योगी सरकार ने कोई सबक सीखा है। भाजपा शासित सरकारें लापरवाही का एक अजूबा बनती जा रही हैं।

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