Saturday, October 21, 2017
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इन चोर दरवाजों से राजनीतिक पार्टियों को मिलता है 'धन'

August 17, 2017 09:25 PM

दान लेने में भाजपा सबसे आगे, कांग्रेस नंबर दो पर

पैसा लेंगी तो फिर क्यूं न लाभ देंगी पार्टियां इन दानकर्ताओं को

मोदी सरकार आज यदि रिलायंस और अदानी ग्रुप को रियायतों से मालामाल कर रही है तो इसमें हैरानी नहीं होनी चाहिए। चुनाव के दौरान लिए दान का एहसान तो सरकार को उतारना ही है। ये जानकर बहुत ताज्जुब होता है कि कार्पोरेट और बड़े बिजनेस घरानों ने २०१२-१३ और २०१५-१६ के बीच कई राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियों को करीब ९५६.७७ करोड़ का दान पार्टी फंड के रूप में दिया। आम आदमी पार्टी का नाम इनमें शामिल नहीं है। इसमें से भारतीय जनता पार्टी के हिस्से ७०५.८१ करोड़ रुपए और कांग्रेस के हिस्से १९८.१६ करोड़ रुपए आए। ये वो धन है जो कि घोषित किया जा चुका है। अघोषित दान कितना दिया, ये एक रहस्य है। मज़ेदार बात ये कि दान कर्ताओं में हमेशा की तरह रीयल एस्टेट, चुनावी न्यास और बड़ी कंपनियां ही शामिल हैं। ज़ाहिर है देश को राजनेता कम ये दानकर्ता अधिक चलाते हैं।

राजनीतिक पार्टियों को अपने पैसे के बल पर दिशा निर्देश देने वाले संस्थान, न्यास और बड़े कार्पोरेट अदारे भले ही खुलकर सामने न आते हों लेकिन फिर भी ऐसा कुछ सामने आ ही जाता है जिससे पता चलता है कि पार्टियां चुनाव लडऩे के नाम पर पार्टी फंड या दान लेना नहीं भूलती। $खास बात ये कि यदि दान २०००० रुपए से अधिक का है तो इसका हिसाब रखना लाजि़मी माना जाता है और यदि इससे कम का है तो हिसाब भी ज़रूरी नहीं समझा जाता। ज़ाहिर है कि बीस हज़ार से कम राशि देने वाले यदि हज़ारों हों तो किसी भी पार्टी के पास अरबों रुपया आ जाता है जिसके बारे न तो देश के चुनाव आयोग को ही कुछ बताया जाता है और न ही किसी अन्य संस्थान को।

सभी राजनीतिक पार्टियों की आय का लेखा जोखा जांचने के बाद एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉ6र्स (एडीआर) ने बताया कि हालांकि सभी पार्टियों को मिले दान का लेखाजोखा भारतीय चुनाव आयोग को चुनाव संपन्न होने के हर वित्तीय वर्ष के भीतर देना होता है लेकिन ज्य़ादातर पार्टियां इस बात की परवाह नहीं करतीं। हाल ही में एडीआर ने भाजपा, इंडियन नेशनल कांग्रेस, एनसीपी, सीपीआई और सीपीएम को २०१२-१३ और वर्ष २०१५-१६ के दौरान मिले दान को खंगाला है। कहा जा सकता है कि चार साल में बड़े व्यापारिक घरानों ने इन पार्टियों को ९५६.७७ करोड़ दान पार्टी फंड के नाम पर दिया है।

पांच राष्ट्रीय राजनीतिक दलों में से सबसे अधिक धन भारतीय जनता पार्टी को मिला। एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक २९८७ कार्पोरेट दानदाताओं ने भाजपा को ७०५.८१ करोड़ रुपया दान दिया जबकि १६७ घरानों ने कांग्रेस को १९८.१६ करोड़ की राशि दान दी। इसी समय के दौरान सीपीआई और सीपीएम को कुल दान का मात्र ४ फीसदी और १.७ फीसदी ही मिला जो सबसे कम था। राजनीतिक दलों को सबसे अधिक दान २०१४ के लोकसभा चुनावों के दौरान मिला। इसमें से सबसे अधिक राशी मोदी के लिए ही दी गई जिसका इस्तेमाल करके भारतीय जनता पार्टी की सरकार वज़ूद में आई। आज मोदी यदि अदानी और रिलायंस को लाभ पहुंचाकर उनका एहसान चुका रहे हैं तो इसमें उन्हें $गल्त 1यों लगेगा।

ध्यान देने योग्य बात ये भी है कि बड़े राजनीतिक घरानों ने चुनावी न्यास बना रखे हैं जिनके जरिए धन राजनीतिक पार्टियों को दिया जाता है ताकि हिसाब किताब में कानून आड़े न आए। बड़े व्यापारिक घरानों की राजनीति में द$खलअंदाज़ी 1यों नहीं होगी जब वे दिल खोलकर दान देते हों। सत्या इले1ट्राल ट्रस्ट का एक ही उदाहरण काफी है। इस ट्रस्ट ने २०१२-१३ से २०१५-१६ के बीच ३५ बार दान दिया और तीन राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को कुल मिलाकर २६०.८७ करोड़ रुपया देकर सबसे बड़े दानी कहलाने का गौरव भी प्राप्त किया। भाजपा ने स्वीकारा कि इस धनराशि में से १९३.६२ करोड़ रुपए उसे मिले जबकि कांग्रेस ने ५७.२५ करोड़ रुपया मिलना स्वीकार किया। एनसीपी ने भी १० करोड़ का अनुदान मिलना स्वीकारा।

सत्या ट्रस्ट के अतिरि1त जनरल इलै1ट्राल ट्रस्ट भी बड़ी बड़ी दानराशि देने के लिए जाना जाता है। इनके अतिरि1त रीयल एस्टेट बिजनेस वाले भी भारी भरकम दान देते हैं ताकि सत्ता में आने पर पार्टियों से लाभ ले सकें। दान का ये सिल्सिला किसी एक पार्टी तक ही नहीं थमता, दान सभी को दिया जाता है, ये सोचते हुए कि जाने कौन सी पार्टी कब सत्ता में आ जाए। दान देने के मामले में अ$खबारी घरानों के मालिक और निर्माण से1टर भी पीछे नहीं रहते। कुछ घराने तो ऐसे भी हैं जो आज तक कभी सामने आए ही नहीं लेकिन फिर भी उनकी पैठ राजनीती के हर क्षेत्र में है।

$गौर करने वाली बात ये भी है कि एडीआर ने भारतीय चुनाव आयोग को कई बार लिखा कि चुनाव लडऩे वाले प्रत्याशी को फार्म २४ए भरते समय कोई खाना खाली नहीं छोडऩा चाहिए लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। इसका परिणाम ये निकला कि ज्य़ादातर प्रत्याशी या पार्टियां बीस हज़ार से अधिक दान में मिली धनराशि को छुपाने में कामयाब हो जाते हैं। कई बार तो दान दाताओं के पैन कार्ड तक का जि़क्र नहीं किया जाता जोकि कानूनन अपराध है। चाहिए तो ये कि मिले दान या पार्टी फंडस को सार्वजनिक किया जाए ताकि सनद रहे कि किस दल ने कितना पैसा किससे लेकर चुनाव लड़ा है लेकिन ये सब नहीं हो रहा। ये चलन आम आदमी पर भारी पड़ रहा है 1योंकि पार्टियों को पैसा देने वाले बाद में उससे कई गुणा वसूलते हैं, अपनी पसंद की योजनाएं लागू करवा कर। इस चलन पर प्रतिबंध समय की मांग है।

 

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