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भाजपा की नीतिओं के मारे, अर्थशास्त्री बेचारे

August 08, 2017 12:44 PM

पहले रघुराम राजन अब पानगढिया ने छोड़ा अहम पद
भारतीय आर्थिकता में सुधार करने का हौंसला अब कौन करेगा ?
नीति आयोग के वाइस चेयरमैन अरविंद पानगढिया का आयोग की नीतियों को लागू करने से पहले ही छोड़ जाना जहां भारतीय जनता पार्टी की सोच पर एक करारा तमाचा है वहीं ये राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की सरकारी कामकाज में कथित अति दखल अंदाजी का दुष्परिणाम भी है। ये कोई पहला मौका नहीं है कि देश के नामी गिरामी अर्थशास्त्री या किसी अन्य फील्ड के माहिर व्यक्ति को इस तरह से अपना काम अधूरा छोडकर विदेश भागना पड़ा हो, इससे पहले भी कई उदाहरण सामने आ चुके हैं। आरबीआई के गवर्नर रघुरमन राजन का भारत छोड़कर जाना भी लोगों को भूला नहीं होगा, वो भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गलत नीतियों को बर्दाश्त न कर पाने के कारण वापस अपनी शिक्षण की नौकरी पर चले गए थे।
जब नरेंद्र मोदी ने 2015 में प्लाॅनिंग कमीशन को समाप्त करके (नीति) एनआईटीआई अर्थात नेशनल इंस्टीच्यूशन फॉर ट्रांसफार्मिंग इंडिया आयोग का गठन किया तो अरविंद पानगढिया को आयोग का वाइस चेयरमैन बनाया गया। पिछली सरकारों के लिए पंचवर्षीय योजनाएं बनाने का जो काम प्लाॅनिंग कमीशन करता आ रहा था उसे सफेद हाथी करार देकर भंग कर दिया गया। अब नीति आयोग भी ले देकर काम तो वही कर रहा है, बस नाम बदला है। मोदी की आर्थिक सुधारों की लहर को पानगढिया ने ही अपनी सोच से नई दिशा दी है। एअर इंडिया का डिस्इंवेस्टमेंट भी नीति आयोग का ही फैसला था। इतना ही नहीं भारतीय रेल के बजट को आम बजट के साथ जोड़ने का आइडिया भी पानगढिया का ही था। यदि सब सही रहा तो अब वित्तीय वर्ष पहली अप्रैल की बजाए पहली जनवरी से आरंभ हो सकता है, जैसा कि पानगढिया का सुझाव था। 

प्रिंसटन युनिवर्सिटी से शिक्षित पानगढिया ने अपने सारे जीवन की प्राप्ति मोदी के कहने पर भारत में आर्थिक सुधारों को समर्पित कर दी। अपना शिक्षण का कार्य छोड़ वे अमेरिका से दिल्ली आ गए। ये बहुत ही दुर्भाग्य की बात है कि जो व्यक्ति मोदी सरकार के आर्थिक सुधारों का चेहरा बनकर उभरा हो उसे सरकार ही नहीं देश भी छोडकर वापस जाना पड़ा हो। पानगढिया की सेवाएं यूं तो 31 अगस्त तक कागजों में रहेंगी लेकिन पता चला है कि वे कोलंबिया युनिवर्सिटी लौट चुके हैं। 


प्रिंसटन युनिवर्सिटी से शिक्षित पानगढिया ने अपने सारे जीवन की प्राप्ति मोदी के कहने पर भारत में आर्थिक सुधारों को समर्पित कर दी। अपना शिक्षण का कार्य छोड़ वे अमेरिका से दिल्ली आ गए। ये बहुत ही दुर्भाग्य की बात है कि जो व्यक्ति मोदी सरकार के आर्थिक सुधारों का चेहरा बनकर उभरा हो उसे सरकार ही नहीं देश भी छोडकर वापस जाना पड़ा हो। पानगढिया की सेवाएं यूं तो 31 अगस्त तक कागजों में रहेंगी लेकिन पता चला है कि वे कोलंबिया युनिवर्सिटी लौट चुके हैं। बता दें कि 64 वर्षीय अरविंद पानगढिया वहां तब तक पढ़ा सकते हैं जब तक कि उनकी सेहत ऐसा करने की आज्ञा दे, क्योंकि यही वहां का नियम है और इसी के तहत रघुरमन राजन और अमत्र्यसेन अमेरिकी युनिवर्सिटियों से जुड़े हुए हैं। सवाल ये है कि नीति आयोग में ऐसा क्या हो रहा है जिसने अरविंद को पद छोडने पर विवश किया ? कहने को आयोग के सीईओ अमिताभ कांत, और पूर्ण कालीन तीन सदस्य विवेेक रॉय, रमेश चंद और वीके सारस्वत भी वहां हैं, लेकिन कहीं ऐसा तो नहीं कि दक्षिणपंथी सोच के मालिक पानगढिया को इनके साथ काम करने में असुविधा हो रही हो ? अमेरिका में प्रिंसटन युनिवर्सिटी से पीएचडी करके कोलंबिया युनिवर्सिटी में इंडियन पॉलिटीकल इकॉनोमी के प्रोफैसर रहे अरविंद पानगढिया एशियन डवलपमेंट बैंक के चीफ इकॉनोमिस्ट भी रहे हैं। उन्होंने वल्र्ड बैंक, इंटरनेशनल मानेटरी फंड और अंकटैड (युनाइटिड नेशंज कांफ्रेंस आन ट्रेड डवलपमेंट) में कई महत्वपूर्ण पदों पर काम किया है। उन्हें पदम भूषण के एजाज से नवाजा जा चुका है। इतने जहीन इंसान से इस तरह चले जाने की उम्मीद नहीं की जा सकती।
असल कारण जो उभर कर सामने आ रहा है वो ये कि आरएसएस के आर्थिक थिंक टैंक एसजेएम (स्वदेशी जागरण मंच) ने कुछ समय पूर्व एक बैठक बुलाई जिसमें नीति आयोग के सभी सदस्यों को बुलाया गया था। बताया जाता है कि पानगढिया सहित बाकी सब लोग मीटिंग से गैर हाज़िर रहे केवल देबराय ही हाज़िर हुए। ये भी बताया जाता है कि एसजेएम ने दरअसल नीति आयोग की इस बात के लिए जमकर निंदा की थी कि आयोग कोई भी योजना गरीबों के हित को ध्यान में रखकर नहीं बनाता बल्कि ये सब निर्धन विरोधी हैं। कदाचित ये बात पानगढिया को नागवार गुजरी। कहा ये भी जा रहा है कि एसजेएम खबरों में बने रहने के लिए आयोग के खिलाफ कुछ भी बोलता है। साथ ही ये भी बताया जा रहा है कि आरएसएस सरकार पर दबाव बना रहा था कि गरीबों की सेहत के लिए कुछ हट कर किया जाए जो शायद आयोग को गवारा न था।
नोबेल पुरुस्कार विजेता और प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमत्र्यसेन के बारे मोदी को ये गलत फहमी हो गई थी कि वे इनके कामों की निंदा करते हैं। दरअसल अमत्र्यसेन अपने लेखों में जहां ये लिखते कि भारतीय अर्थिकता को कैसे विकास की राह पर लाया जा सकता है वहीं वे प्रधानमंत्री के कामों की आलोचना करने के साथ साथ कांग्रेस के उप प्रधान राहुल गांधी की तारीफ करना भी नहीं भूलते थे। इससे मोदी के साथ उनकी दूरियां बढ़ती ही चली गईं और उन्होंने तो यहां तक कह दिया था कि वे मोदी को अपना प्रधानमंत्री ही नहीं मानते और अपने ही देश में सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे। देश के इतने पढ़े लिखे और नाम गिरामी लोग यदि भाजपा और आरएसएस के बारे ये सोचते हैं तो इसका जवाब भी भाजपा को ही देना होगा।
यहां ये भी ध्यान देने योग्य है कि भारतीय रिजर्व बैंक के गर्वनर रहे रघुराम राजन को भी आरएसएस और स्वदेशी जागरण मंच की दखलअंदाजी के कारण ही अपना पद छोडना पड़ा था। सुब्रामणियम स्वामी ने तो प्रधानमंत्री को यहां तक लिखा था कि राजन दिमागी तौर पर भारतीय नहीं है इसलिए इन्हें चलता किया जाए। एसजेएम के थिंक टैक गुरुमर्ति ने राजन के पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स को सही तरीके से हल न कर पाने का दोष लगाया था। गुरुमूर्ति को लगता था कि पीएसयू के नॉन परफार्मिंग एसेटस के सुधार के नाम पर विदेशी बैंकों का भारत में आगमन बढ़ जाएगा। जब तक यूपीए सरकार थी तब तक को बात दूषणबाजी तक रही लेकिन भाजपा सरकार के आते ही गुरूमूर्ति रघुराम राजन को बाहर निकालने पर तुल गए। नतीजा सामने है, राजन को हटाकर अंबानी के पिट्ठू को भारतीय रिजर्व बैंक का गवर्नर बना दिया गया।

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