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शिक्षा बज़ट में योगी ने की कटौती तो लोगों ने कहा ‘आप’ की दिल्ली सरकार से कुछ सीखो ‘योगी’

July 26, 2017 09:40 AM
योगी आदित्य नाथ के लिए फज़ीहत का सबब बना शिक्षा बजट

ए.के.के ब्यूरो

उच्च शिक्षा के बजट में ज़बरदस्त कटौती करके बुरी फंसी योगी सरकार
शिक्षा के क्षेत्र में दिल्ली के मुकाबले कहीं नहीं टिकते आदित्य नाथ
भारतीय जनता पार्टी ने अपने ताज़ा शिक्षा बजट से एक बार फिर सिद्ध कर दिया है कि शिक्षा उनके लिए कोई खास मायने नहीं रखती। यदि उनके लिए शिक्षा का कोई मोल होता तो बजट में इस तरह से कटौती नहीं की जाती। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उच्च शिक्षा बजट को पिछले साल 2742 करोड़ रुपए से घटाकर 272 करोड़ रुपए पर ला खड़ा किया है। चुनावी घोषणापत्र में छात्रों को लैपटॉप देने का वादा था, बजट में उसका ज़िक्र तक नहीं है। आधुनिक युग में जहां विश्व भर में शिक्षा को सर्वाधिक महत्व दिया जा रहा है वहां भाजपा यूपी को एक अनपढ़ राज्य में परिवर्तित करने पर उतारू है। सोशल मीडिया पर योगी की खूब फजीहत हो रही है। 

 मुख्य बिंदु:

  • योगी सरकार ने शिक्षा बजट में कटौती तो लोगों ने कहा दिल्ली से सीखो शिक्षा का महत्व
  • सैकंडरी शिक्षा के बजट में 9414 करोड़ का कट लगाया
  • उच्च शिक्षा के क्षेत्र में की गई करीब 2469 की कटौती
  • लैपटॉप के वादे से भी मुकरे योगी


पुरानी कहावत है, हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और, उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार इससे भी दो कदम आगे जाती नज़र आ रही है। देश के सबसे बड़े राज्य में शिक्षा के प्रचार एवं प्रसार के लिए अमूमन सभी राज्यों से अधिक बजट की आवश्यकता रहती है लेकिन प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शिक्षा जैसे संजीदा मुद्दे को अपने बजट में बहुत ही हल्के से लिया है। अपने लोक संकल्प पत्र में उन्होंने मेधावी छात्रों के लिए लैपटॉप देने का ज़िक्र करके जो वाहवाही लूटी थी वो अब हाशिए पर जाती नज़र आ रही है। ऐसा इसलिए कि गत दिनों राज्य के वित्त मंत्री राजेश अग्रवाल ने बजट में कहीं भी लैपटॉप देने का ज़िक्र तक नहीं किया।
मौजूदा उच्च शिक्षा बजट में 2469.73 करोड़ की कमी कर दी गई है। जहां पिछले साल ये बजट 2742 करोड़ रुपए था वहीं इस बार कम करके इसे 272.77 करोड़ कर दिया गया है। योगी सरकार की इस नीति ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
बुद्धिजीवी वर्ग इसकी तुलना दिल्ली सरकार के बज़ट से कर रहा है। दिल्ली में इस बार भी शिक्षा के लिए एक अच्छा खासा बजट रखा गया है। आम आदमी पार्टी की दिल्ली सरकार ने वर्ष 2016-17 के अपने 46000 करोड़ के कुल बजट का 23 फीसदी यानि 10,690 करोड़ रुपया शिक्षा पर खर्च किया। इतना ही नहीं साल 2017-18 के लिए भी दिल्ली सरकार ने कुल बजट का 25 फीसदी शिक्षा पर खर्च करने का फैसला लिया है। अपने 48000 करोड़ रुपए के सालाना बजट में केजरीवाल सरकार ने 11300 करोड़ रुपया शिक्षा के लिए रखा है। ये उस हाल में उत्तर प्रदेश से कहीं अधिक है जबकि दिल्ली अभी तक एक पूर्ण राज्य भी नहीं है।
भाजपा से पहले सत्तासीन समाजवादी पार्टी ने छात्रों को स्कूल बैग और लैपटॉप ही दिए बल्कि पाठ्य सामग्री, खाने की प्लेटें और अन्य सामान भी बांटा था। जिस सरकार को भाजपा पिता पुत्र की लड़ाई का केंद्र कहकर निंदा करती आई है वह सरकार कम से कम शिक्षा के मामले में तो इनसे कहीं बेहतर थी। यदि चुनाव न घोषित हो गए होते तो सपा छात्रों को बहुत कुछ और दे गई होती। अभी उन्होंने आठवीं के छात्रों को करीब 1.8 करोड़ रुपए के बैग ही बांटे थे कि चुनावों की घोषणा हो जाने और आचार संहिता लागू हो जाने के कारण रोक दिया गया। चर्चा तो ये भी है कि आदित्यनाथ को तो छात्रों का कल्याण करने से कोई रोक भी नहीं रहा तो फिर शिक्षा क्षेत्र से ऐसा दुर्व्वहार क्यों?

ऽ बात यहीं खत्म नहीं होती। भाजपा ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में सभी मेधावी छात्रों को लैपटॉप देने का वादा किया था। लेकिन कहा जाता है कि वो वादा ही क्या जो वफा हो गया। यही कारण है कि प्रस्तावित बजट में इस मद का ज़िक्र तक नहीं है। गत वर्ष की पिछली सरकार के बजट को देखें तो उच्च शिक्षा के लिए 2742 करोड़ अवंटित बजट योगी सरकार ने जहां एक ओर मात्र 272 करोड़ रुपए कर दिया वहीं इसी अवधि में सैकेंडरी शिक्षा के बजट को भी गत वर्ष के 9990 करोड़ के मुकाबले योगी सरकार ने 576 करोड़ रुपए कर दिया। इस बजट में 9414 की कटौती कर सरकार सैकेंडरी शिक्षा की ओर कितना ध्यान देगी, अंदाज़ा लगाया जा सकता है।
यूं तो भाजपा ने चुनाव से पहले अपने लोक कल्याण संकल्प पत्र, जिसे उनका चुनावी घोषणापत्र माना गया, के जरिए छात्रों, किसानों व मज़दूरों को सहायता व सहूलतें देने के लंबे चैड़े वादे किए थे। अब जो बजट सामने आया है उससे साफ है कि छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। बता दें कि एक सर्वेक्षण के मुताबिक पिछले पांच वर्षों में सरकारी स्कूलों में एक करोड़ 30 लाख छात्रों की कमी आई है जबकि इसी समय के दौरान निजी स्कूलों में एक करोड़ 70 लाख छात्रों की वृद्धि हुई है। ये आंकड़े इस ओर इशारा करते हैं कि सरकारी स्कूलों में वो सब सहूलतें और स्तर नहीं मिलता जो निजी स्कूलों में मिलता है। दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के 24.4 फीसदी स्कूलों में यदि सुरक्षित और साफ पीने का पानी उपलब्ध नहीं है तो 34.8 फीसदी स्कूलों में शौचालय नहीं हैं। ऐसे में स्कूलों की हालत क्या होगी अंदाज़ा लगाना आसान है। यही कारण है कि छात्रों का सरकारी स्कूलों से मोहभंग हो रहा है। देश भर में हर क्षेत्र में कीमतों में वृद्धि होने के बावजूद यदि शिक्षा के बजट में इस कदर कटौती की जाएगी तो शिक्षा का क्या हाल होगा और देश का भविष्य कैसा होगा यह तो योगी ही जाने।

       

 

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