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An Insignificant Man एक फिल्म जिससे राजनीति में आ सकता है 'भूचाल'

May 29, 2017 08:01 AM

अरविंद केजरीवाल की अच्छाईयां जिस दिन जनता भलीभांति जान गई उस दिन से उसे देश के बाकी नेता खलनायक लगने लगेंगे और तब देश में नेतृत्व के लायक दूर-दूर तक कोई नायक जनता को दिखाई नहीं देगा संभवतयः इसी सोच के साथ अरविंद केज़रीवाल को मिटा डालने के लिए तमाम भ्रष्ट शक्तियां एक जुट हो पूरा-पूरा जोर लगाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहती। अब तक तमाम राजनीतिक दल, भ्रष्ट अफसरशाही व मीडिया इत्यादि प्रमुख रूप से एकजुट होकर अरविंद को मिटाने के अभियान में जुटे थे किंतु अब सेंसर बोर्ड भी इसमें अपनी भूमिका निभा लेना चाहता है। अब सवाल उठने स्वाभाविक हैं कि इस फिल्म में ऐसा क्या है कि इससे देश की राजनीति में भूचाल आ सकता है ? जानकर मानते हैं कि फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है जिस पर सेंसर बोर्ड अथवा BJP को आपति हो किन्तु बीजेपी व BJP भक्तों के डर की कोई सीमा भी तो नहीं है  

विश्व के बहुत से फिल्म समारोहों में देखी और सराही जा रही डॉक्यूमेंट्री An Insignificant Man  को पास करने के लिए भारत में सेंसर बोर्ड राजनीति पर उतर आया है। दूसरे शब्दों में कहें तो सेंसरबोर्ड अपनी गरिमा भूल भाजपा के दलाल की भूमिका में यहां दिखाई दे रहा है।


अरविंद केजरीवाल पर बनी भारत की ये फिल्म ब्राजील की राष्ट्रपति ने भीड़ में बैठ कर देखी, लेकिन हमारा तंत्र इस फिल्म को पर्दों पर उतर जाने से भयभीत है। यहां इस फिल्म को सेंसर बोर्ड प्रमाणित करने से पहले बेहद जहिलाना मांग कर रहा है। सेंसर कहता है कि फिल्म रिलीज़ करने के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी व शीला दीक्षित का अनापत्ति प्रमाण पत्र लेकर आओ। अखिर क्यूं हम अरविंद केज़रीवाल की ईमानदारी से इतना डरते हैं ? पार्टी के भीतर रहकर भाजपा के हाथों खेल रहा एक मंत्री जब अरविंद केज़रीवाल के खिलाफ अर्नगल आरोप लगाने लगता है तो मीडिया उसके सुर से सुर मिलाकर अरविंद को सबसे भ्रष्ट साबित करने पर तुल जाती है किंतु इस व्यक्ति की विश्वसनीयता का शिखर देखिए कि विपक्ष तक उसकी ईमानदारी पर सवाल करने से गुरेज करता है। जनता समझने लगती है कि राजनीति के दुष्चक्र किस कदर एक ईमानदार को भ्रष्ट साबित करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं।
विश्व के बहुत से फिल्म समारोहों में देखी और सराही जा रही डॉक्यूमेंट्री An Insignificant Man  को पास करने के लिए भारत में सेंसर बोर्ड राजनीति पर उतर आया है। दूसरे शब्दों में कहें तो सेंसरबोर्ड अपनी गरिमा भूल भाजपा के दलाल की भूमिका में यहां दिखाई दे रहा है। फिल्म के निदेशक विनय शुक्ला और खुशबू रांका बताते हैं कि सेंसर बोर्ड इस फिल्म से बेहद भयभीत है।
‘शिप ऑफ थिसीयस’ फेम फिल्ममेकर आनंद गांधी ने ‘एन इनसिग्निफिकेंट मैन’ यानी ‘एक मामूली आदमी’ नाम की डॉक्यूमेंट्री फिल्म प्रोड्यूस की है. इसे दो युवाओं ने डायरेक्ट किया है, खुश्बू रांका और विनय शुक्ला. इन दोनों ने दिसंबर 2012 में यानी करीब पांच साल पहले इसे शूट करना शुरू किया था. तब भारतीय राजनीति में आम आदमी पार्टी की एंट्री होने वाली थी. खुशबू और विनय ने पार्टी की अंदरूनी बैठकों, सम्मेलनों, घटनाओं और लोगों को वीडियो कैमरा लेकर फॉलो किया.
लंबे समय में बनकर तैयार हुई इस फिल्म का प्रीमियर दुनिया के प्रतिष्ठित टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल-2016 में 11 सितंबर को हुआ. फिर अक्टूबर में भारत में इसे मामी फिल्म फेस्टिवल में दिखाया गया. तब से फ्रांस, अर्जेंटीना, कैनेडा, ऑस्ट्रेलिया, मैक्सिको, इजरायल, न्यू यॉर्क जैसी कई जगह इसकी स्क्रीनिंग हो चुकी है और सब जगह से बेहद उत्साहित करने वाली प्रतिक्रियाएं आई हैं.
दो महीने पहले 30 मार्च में स्विट्जरलैंड के जेनेवा में ब्राजील की पूर्व-राष्ट्रपति डिल्मा रूजेफ ने भी भीड़ में बैठकर An Insignificant Man  देखी. 1997 में ‘द आइडिया ऑफ इंडिया’ जैसी बेहद महत्वपूर्ण और आइकॉनिक बुक लिखने वाले सुनील खिलनानी ने इस डॉक्यूमेंट्री के बारे में लिखा, “भारतीय लोकतंत्र और दुनिया में जहां भी पॉपुलर पॉलिटिक्स है उनके छायांकन में यह फिल्म एक लैंडमार्क है.”
अब फिल्म को भारत में रिलीज करने की तैयारी है लेकिन केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) ने उसे सर्टिफिकेट नहीं दिया है. डायरेक्टर्स का कहना है कि बोर्ड के प्रमुख पहलाज निहलानी ने उन्हें कहा है कि फिल्म में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और दिल्ली की पूर्व-मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की फुटेज है इसलिए फिल्म को सर्टिफिकेट तभी मिलेगा जब वे लोग इन तीनों से अनापत्ति प्रमाण पत्र यानी No Objection Certificate लेकर आएंगे.
इस किस्म की मांग सेंसर बोर्ड ने पहले कभी नहीं की. क्योंकि राजनेता पब्लिक फिगर हैं और वे पब्लिक रैलियों में क्या बोलते हैं उसे कला जगत में पुनर्निर्मित करने के लिए किसी मंजूरी की जरूरी नहीं है. ये काम पत्रकार, कलाकार, लेखक तब से करते आए हैं जब लोकतंत्र बना भी न था. लेकिन पहलाज निहलानी इससे पहले भी हैरान करने वाले फैसले ले चुके हैं. जैसे उन्होंने ‘लिपस्टिक अंडर माई बुर्का’ को इसलिए पास करने से मना कर दिया क्योंकि उनको ये लेडी ओरिएन्टेड फिल्म लगी जिससे शायद समाज खराब हो. कुल मिलाकर सेंसर बोर्ड में बैठ कर पहलाज निहालनी न सिर्फ पद की गरिमा को दागदार कर रहे हैं बल्कि देश की जनता के साथ भी अन्याय कर रहे हैं।

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