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लोकतंत्र के माथे के कलंक EVM को सुधारने के संकल्प के साथ Aam Aadmi Party का आन्दोलन शुरू

गोपाल शर्मा | May 11, 2017 04:57 PM
गोपाल शर्मा

इतिहास में पहली बार किसी राजनैतिक पार्टी का चुनाव आयोग के बाहर प्रदर्शन EVM के मुद्दे पर वीरवार को चुनाव आयोग के समक्ष आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता गोपाल राय की अगुवाई में जोरदार प्रदर्शन किया गया. देश के इतिहास में  किसी राजनीतिक पार्टी द्वारा चुनाव आयोग को ज्ञापन देने की रीत से एक कदम आगे बढ़ते हुए आम आदमी पार्टी ने ईवीएम के खिलाफ चुनाव आयोग के समक्ष आंदोलन की जबरदस्त नींव रखी, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आम आदमी पार्टी द्वारा छेड़ा गया यह अभियान देश में लोकतंत्र की गरिमा व अस्तित्व दोनों को बचाए रखने की दृष्टि से महत्वपूर्ण कदम है। लोकतंत्र बचाओ अभियान का आगाज़ करते हुए आम आदमी पार्टी के विधायक और कार्यकर्ताओं ने दिल्ली के अशोक रोड़ स्थित चुनाव आयोग के मुख्यालय पर प्रदर्शन करते हुए मांग की कि भविष्य में होने वाले हर चुनाव VVPAT के साथ करावाए जाएं. दूसरी मांग है कि चुनाव के बाद 25 फीसदी EVM के नतीजों का मिलान VVPAT से निकली पर्ची से कराया जाए.

तकनीक के माथे पर कलंक है ईवीएम

ईवीएम मशीन को इस सदी में कम्प्यूटर तकनीकि का सबसे बड़ा दुरुपयोग कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। यह वास्तव में टेक्नालाजी के माथे पर कलंक है। गरीब देशों के लोगों के मौलिक अधिकारों के रास्ते मंे सबसे बड़ी रुकावट है. इनके द्वारा हमारे देश पर कुछ विदेशी शक्तियों, परिवारों उनके उद्योग-धन्धों का कब्जा हो गया जान पड़ता है.  हम अदृश्य गुलामी में जीने के लिए इसी ईवीएम के कारण विवश लगते हैं। इसी खतरे से बचने के लिये सब अमीर देशों ने पेपर बैलट को दोबारा अपनाया है. अरबों डालर खर्च करने के बाद यहां इन मशीनों को कचरे में फेंक दिया गया है, इन्हें असंवैधानिक घोषित कर दिया गया है। सवाल ये उठता है कि इस मुद्दे पर भारत में सब पार्टियां चुप क्यों है जाहिर है सब पर किसी बड़ी शक्ति का अनदेखा दबाव है। और पार्टियां इस बात से भी घबराती हैं कि अब बोलने का अर्थ होगा ये साबित करना कि पिछले 15 साल से भारत में प्रजातंत्र है ही नहीं।

........तो क्या लाभ है ईवीएम के

- ये सस्ती भी नहीं हैं, क्योंकि इन्हें हर दस साल में अपडेट करना बहुत महंगा पडता है। न इनसे कागज की कोई खास बचत होती है क्योंकि जितना कागज 5 साल मे 3, 4 बार चुनाव बैलट पेपर में लगता है, उससे ज्यादा कागज का तो हर रोज अखबार छप जाता है। फिर अचानक यहां पर कागज बचाने की बात कितनी तर्क संगत है।

- अगर ये कहा जाए कि इन मशीनों को सुरक्षित करने के लिये प्रिंटेड पर्ची लगा दी जाएगी, तो उसका फायदा क्या है प्रिंटेड पर्ची को हाथ से गिनना पडे़गा. तो फिर पेपर बैलट को ही गिनने में इतना नखरा क्यों ?

- अगर इन मशीनों के कोई फायदे हों भी, तो भी क्या इनसे होने वाले भारी नुकसान को देखते हुए इनका प्रयोग उचित है ?

- ऐसे में एक जागरूक नागरिक का क्या कर्तव्य है ? क्या हम चुपचाप पार्टियों की मजबूरी देखते रहें और अपने मौलिक अधिकारों का हनन होना भी सहते रहें या फिर एकजुट हो कर इस मशीन पर प्रतिबन्ध लगाने की मांग करें क्या हमें पेपर बैलट को वापिस लाने के लिये अभियान नहीं छेड़ना चाहिए ?

- आने वाले हर विधान सभा चुनाव में पेपर बैलट की मांग करें, यह मत सोचिये कि अगर ईवीएम से आप की मनपसन्द पार्टी जीत गई तो ये इस बात का सबूत है कि कोई गड़बड नहीं है। संभवतयः यदा-कदा ईवीएम पर हमारा भरोसा बनाए रखने के लिए ऐसा किया जाए और हम पेपर बैलट की मांग न करें।

क्यों प्लांट किया जाता है मिलता-जुलता सिम्बल ?

ईवीएम पर खोज कर रहे अन्वेषणकर्ताओं का मानना है कि ईवीएम मशीन से वोटों की चोरी बहुत आसान है। यह जरूरी नहीं कि लोगों ने बेवकूफ बन कर इन फर्जी उम्मीदवारों या गलत चुनाव चिन्ह को वोट दिया हो। दरअसल यह नकली उम्मीदवार और चुनाव चिन्ह इसलिये रखे जाते हैं ताकि ईवीएम से कुछ प्रतिशत वोट इधर-उधर शिफ्ट कर जीतने वाले उम्मीदवार की हार सुनिश्चित की जा सके। आम आदमी पार्टी द्वारा पहली बार लड़े गए विधान सभा चुनावों में यदि जलती हुई टार्च जो कि झाडू की तरह नजर आती थी के मतों को आम आदमी पार्टी के खाते में जोड़ दिया जाए तो आम आदमी पार्टी को पहली ही दफा विधान सभा चुनावों में स्पष्ट बहुमत मिल गया होता। जलती टार्च का यह सिम्बल किसी बड़े षड़यंत्र की ओर ही इशारा था।

खबरें जो चौंकाती भी है..और सवाल भी खड़े करती हैं...

19 अप्रैल 2014 को उड़ीसा के एक सरकारी अधिकारी के घर में 28 वोटिंग मशीनें पाई गई। लोगों ने गुस्से में नारे लगाए कि प्रजातंत्र के हत्यारों को सजा दो लेकिन कुछ नहीं हुआ। बस 21 अप्रैल तक के लिये शहर में सख्त कानून लगा दिया गया ताकि कोई बोल कर इस खबर को फैला न सके। ऐसा क्यों और कैसे हुआ, सच्चाई क्या थी किसी ने भी जानने की कोशिश ही नहीं की ।

वोटिंग मशीन के विरुद्ध अभियान:

बहुजन मुक्ति पार्टी ने वोटिंग मशीन के खिलाफ एक अभियान शुरु किया। इस सूचना को मीडिया ने कोई महत्व न देकर खबर को दबाने में योगदान दिया। जंतर मंतर पर हुई एक सभा में पार्टी नेताओं ने कहा कि उन्हें देश भर से ईवीएम की धांधली की खबर मिली है। राष्ट्रपति को एक पत्र लिख कर चुनाव आयोग के कार्यों को संदिग्ध बताया गया। 20 राज्यों के 535 जिलों में लोगों को चुनाव आयोग के इन संदिग्ध कार्यों की जानकारी देते हुए आयोग के विरुद्ध आवाज उठाने को कहा गया। अमरीका और यूरोप के विकसित भागों में मशीन का प्रयोग बन्द कर दिया गया है तो भारत में इसे क्यों बंद नहीं किया जा सकता ? जैसे सवाल उठाए गए। खबरों के मुताबिक इसी पार्टी के एक नेता वामन मेशराम ने कहा है कि उनके पास सबूत है कि मशीन बहुत जगह पर गलत थीं और चुनाव आयोग ने कुछ नहीं किया।

उनका कहना है कि बनारस मे 55 फीसदी वोटिंग के अनुसार कुल वोट 842,840 होने चाहिये थे। गणना पर 10,30,685 पाये गये। कहां से आए ये दो लाख फालतू वोट ? यह बड़ा सवाल है। इसी प्रकार गुजरात के मंत्री पटेल ने पहले ही कह दिया कि मोदी 5 लाख वोटों से जीतेंगे और यही हुआ. कैसे पता चल गया इन्हें  इतने सही नम्बर का ? वामन मेशवान ने कहा कि महाराष्ट्र में कांग्रेस के उम्मीदवारों को जिताने के लिये बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवारों को दबा दिया गया। कई जगह पर उनके नाम ही रद्द कर दिये गये। पंजाब में भी इसी तरह के कई मामले सामने आए।

एक मामला यह भी:

कोई भी बटन दबाओ वोट भाजपा को

असम के जोरहाट में एक इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) की मॉक टेस्ट ने चुनाव कर्मियों के होश उड़ा दिए। कोई भी बटन दबाने पर यह मशीन वोट बीजेपी के खाते में डाल रही थी। जोरहाट संसदीय क्षेत्र के रिटर्निंग ऑफिसर और उपायुक्त विशाल वसंत सोलंकी के मुताबिक सारी मशीनों की टेस्टिंग इलेक्ट्रॉनिक कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया के इंजीनियर कर रहे थे। इलेक्ट्रॉनिक कॉर्पोरेशन उन दो कंपनियों में शामिल है जो ईवीएम बनाती हैं।  जोरहाट में 7 अप्रैल 2014 को वोटिंग हुई। यहां से कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री विजय कृष्ण हांडिक के आदिवासी नेता कामाख्या तासा बीजेपी की तरफ से मैदान में थे। राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी विजेेंद्र के अनुसार जोरहाट में एक ईवीएम में गड़बड़ी मिली है। यह मशीन खराब थी, इस ताजा मामले के प्रकाश में आने से ईवीएम मशीनों की विश्वसनीयता एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है।

 क्या वाराणासी संसदीय सीट से नरेंद्र मोदी की जीत भी इसी षड्यंत्र की जीत है ?

क्या वाराणासी संसदीय सीट से नरेंद्र मोदी की जीत एक षड्यंत्र की जीत है ? यह सवाल तब और भी प्रासंगिक हो जाता है जब  3,71,784 वोटों से जीत हासिल करने वाले मोदी जी के संसदीय क्षेत्र में 3,11,057 फर्जी वोटरों का भंडाफोड़ हो जाए। अभी गिनती जारी है और जिला प्रशासन का अनुमान है कि फर्जी वोटरों की संख्या 6,47,085 जा सकती है। इतनी बड़ी संख्या में फर्जी वोटरों का यह खुलासा वाराणसी का ही नहीं बल्कि देश का पहला बड़ा खुलासा है। इन लाखों की तादाद में मिले फर्जी वोटरों का खुलासा तब हुआ जब भारत निर्वाचन आयोग के निर्देश पर जिला प्रशासन ने मतदाता सूची का पुर्ननिरीक्षण अभियान शुरू किया। जिले के सभी पोलिंग सेंटर पर तैनात बूथ लेबल ऑफिसर से घर-घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन करवाने के बाद इन बोगस वोटरों का पर्दाफाश हुआ है।  वाराणसी संसदीय सीट पर हुए चुनाव में बीजेपी उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल को 3,71,784 वोटों के अंतर से हराया था। तीसरे नंबर पर कांग्रेस उम्मीदवार अजय राय (75614)व चौथे स्थान पर बीएसपी के विजय प्रकाश जायसवाल (60579) और पांचवें स्थान पर एसपी के कैलाश चौरसिया  को 45291 वोट मिले। नरेंद्र मोदी की भारी मतों से जीत को लेकर गैर बीजेपी दल तरह-तरह के आरोप लगाते रहे हैं। मोदी पर मतदाताओं को उपहार बांटकर प्रभावित करने के साथ-साथ घोषणा पत्र में पत्नी जशोदा बेन के आय का ब्यौरा न देने का आरोप लगाते हुए कांग्रेस के उम्मीदवार अजय राय ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वाराणसी से निर्वाचन को चुनौती देते हुए याचिका दायर की है। हाईकोर्ट में इस पर सुनवाई चल रही है. इस बीच भारत निर्वाचन आयोग के निर्देश पर पहली जनवरी 2015 को 18 साल की उम्र पूरी करने वाले युवाओं का नाम वोटर लिस्ट में जोड़ने व मतदाताओं के सत्यापन का काम चला। इस दौरान लाखों की संख्या में फर्जी वोटर सामने आए हैं। जिला प्रशासन ने तीन लाख से ज्यादा जिन फर्जी वोटरों की अभी तक शिनाख्त की है, वे एक ही विधानसभा क्षेत्र की सूची में दो जगह अपना नाम दर्ज कराने वाले थे। पुर्ननिरीक्षण अभियान के दौरान पकड़े गए 3,11057 वोटरों का नाम यहां चुनाव आयोग सूची से हटवाया गया। वोटरों का इतनी बड़ी संख्या में फर्जीबाड़ा किसके कहने पर हुआ यह जाँच का विषय है.

ऐसे पकड़े गए फर्जी वोटर:

फर्जी वोटरों का नाम काटने के साथ नए मतदाताओं का नाम जोड़ने के लिए जिले की 8 विधानसभा क्षेत्रों के 1136 पोलिंग सेंटरों के 2553 पोलिंग बूथ पर तैनात 2553 बूथ लेवल ऑफिसरों ने घर-घर जाकर वोटरों का सत्यापन किया। इस सत्यापन के दौरान फर्जी वोटरों को पकड़ा गया। सहायक जिला निर्वाचन अधिकारी दया शंकर उपाध्याय ने बताया कि सबसे ज्यादा 81697 फर्जी वोटर कैंट विधानसभा क्षेत्र में पकड़े गये हैं। पिंडरा विधानसभा क्षेत्र में 35982 अजगरा में 15285 शिवपुर में 10981 रोहनिया में 19659 शहर उत्तरी में 70684 शहर दक्षिणी में 69397 और सेवापुरी में 7372 फर्जी वोटर पकड़े गए हैं। इनका नाम वोटर लिस्ट से बाहर किया गया है।

हर बटन दवाने वोट भाजपा को ही क्यों आम आदमी पार्टी ने उठाए सवालः

हर बटन पर सिर्फ बीजेपी को ही वोट देने वाली ईवीएम कानपुर के गोविंदनगर से गईं थी। चुनाव आयोग की ऐसी क्या मजबूरी थी कि नियम-कानून ताक पर रखकर यूपी चुनाव की ईवीएम मध्य प्रदेश भेजी गई, यूपी चुनाव में बड़े स्तर पर हुई है

ईवीएम के साथ छेड़छाड़, सभी मशीनों की जांच की जाए।

 जिस तरह से मध्य प्रदेश में एक ऐसी ईवीएम सामने आई है जिसमें कोई भी बटन दबाने पर बीजेपी को वोट जा रहा है। यह भी सुनने में आया है कि उस मशीन समेत कुल 300 मशीनें उत्तर प्रदेश के कानपुर के गोविंदनगर से मध्य प्रदेश के उपचुनाव के लिए मंगाई गईं हैं। ऐसा इन मशीनों में क्या खास था जो नियम-कानूनों को तोड़ते हुए ये विशेष ईवीएम ही मध्य प्रदेश भेजी गई हैं ऐसा देखने के बाद देश के लोकतंत्र पर बड़ा प्रश्न चिन्ह लग जाता है। आम आदमी पार्टी चुनाव आयोग से मांग की है कि ऐसी मशीनों की जांच कराई जाए और सच्चाई जनता के समक्ष रखी जाए। इस मुद्दे पर पत्रकारों को सम्बोधित करते हुए आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री  अरविंद केजरीवाल ने कहा कि हाल ही में सामने आया कि मध्य प्रदेश के भिंड में होने वाले उपचुनाव में इस्तेमाल होने वाली इवीएम में कोई भी बटन दबाने पर वीवीपैट मशीन से बीजेपी के चुनाव चिन्ह की ही पर्ची निकल रही थी और उस पर बीजेपी प्रत्याशी सत्यदेव पचैरी का नाम छपकर आ रहा था। उत्तर प्रदेश के कानपुर की गोविंदनगर विधानसभा से सत्यदेव पचैरी बीजेपी की तरफ से चुनाव लड़े थे और भारी अंतर से जीत दर्ज की थी, चुनाव आयोग ने भी यह स्वीकार कर लिया है कि मध्य प्रदेश में ये मशीनें उत्तर प्रदेश की गोविंदनगर विधानसभा से ही गईं हैं। नियम यह कहता है कि किसी भी चुनाव नतीजों के बाद 45 दिन तक उसमें इस्तेमाल हुईं मशीनें किसी दूसरी जगह नहीं भेजी जा सकती क्योंकि अगर कोई भी नतीजों को लेकर कोई याचिका लगा देता है तो मशीनों का क्रॉस-सत्यापन किया जा सके। लेकिन चुनाव आयोग ने सारे नियम-कानूनों को ताक पर रखकर यूपी चुनाव में इस्तेमाल हुईं मशीनों को समय से पहले ही मध्य प्रदेश भेज दिया।

- इन सब बातों के सामने आने के बाद आम आदमी पार्टी ने चुनाव आयोग से कुछ सवाल पूछे हैं।. ऐसी क्या मजबूरी थी कि मध्य प्रदेश के उपचुनाव के लिए ईवीएम उत्तर प्रदेश के गोविंदनगर विधानसभा से भेजी गईं,

- इन मशीनों में ऐसा क्या खास था जो सारे नियम-कानूनों को तोड़ते हुए चुनाव आयोग ने वक्त से पहले ही इन मशीनों को किसी दूसरी जगह इस्तेमाल करने के लिए भेज दिया.

- सिर्फ बीजेपी को वोट डाल रही टैम्पर्ड़ ईवीएम को बदलने कि बजाए उसकी जांच क्यों नहीं कराई जा रही है,

आम आदमी पार्टी ने शक जाहिर करते हुए कहा है कि बाकि 300 मशीनों के सॉफ्टवेयर के साथ भी छेड़छाड़ की गई है और मांग की है कि उसकी टैम्पर्ड़ मशीन के साथ-साथ उन सभी मशीनों की भी जांच कराई जाए। हालांकि चुनाव आयोग का कहना है कि इवीएम की चिप के साथ छेड़छाड़ नहीं की जा सकती क्योंकि उसकी चिप को पढ़ा नहीं जा सकता। लेकिन पार्टी का मानना है कि चिप के साथ और सॉफ्टवेयर के साथ छेड़छाड़ संभव है। पार्टी ने चुनाव आयोग से गुजारिश की है कि या तो आयोग खुद उस मशीन के सॉफ्टवेयर और चिप की जांच कराके सारी सच्चाई जनता के समक्ष रखे और या फिर वो मशीन हमें दे दें। केजरीवाल ने कहा है कि हमारे पास एक्सपर्ट मौजूद हैं हम उस मशीन की 72 घंटे में जांच कराके नतीजे के साथ मशीन वापस चुनाव आयोग को सौंप देंगे। अपनी तकनिकी दक्षता का प्रदर्शन aam aadmi party विधानसभा में कर ही चुकी है. देश के लोकतंत्र को बचाने के लिए ऐसा करना बेहद जरुरी है।

 

 

 

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