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देश का विकास कैसे? संघ के 50 संगठनो से या राज्यों और दलों की एकता से?

February 21, 2015 06:05 PM

संघ ने अपने संगठनो से कहा की मिलकर चलो वरना सफल नहीं होगे|

 १७ फरवरी के समाचार पत्र में पढ़ा था की संघ ने कानपुर में अपने 50 से अधिक संगठनो के पदाधिकारियों को कहा है कि मिल कर चलो वर्ना सफल नहीं हो पाओगे| निसंदेह बहुत ही सुंदर बात कही| पर क्या इन 50 संगठनो के मिलकर चलने से देश की स्थिति बदल सकती है?? या फिर इस देश के नागरिकों तथा केंद्र और राज्य सरकारों के मिलकर विकास कार्य करने से देश का विकास होगा? क्या संघ को यह साफ़ नहीं करना चाहिए की आखिर किस उद्देश्य कि पूर्ती वह चाहता है? खैर, संघ का उद्देश्य चाहे जो भी रहा हो, संघ ने जो कहा उसे अगर और गहराई से देखा जाए तोवह सिर्फ अपने 50 संगठनों को ही अपना मानता है और उन्ही की एकता और अखंडता की वह बात कर रहा है, जिन्हें मिलकर चलने की हिदायत दी है|  अब कोई यहाँ यह प्रश्न भी कर सकता है की संघ अपने कार्यक्रम में था इसीलिए उसने सिर्फ इन्ही संगठनो को निर्देशित किया| तो बताना चाहेंगे कि समय-समय पर संघ ने अपने कार्यक्रमों में ही देश के नाम सन्देश दिया है जैसे घर वापसी पर , महिलाओ का बच्चे पैदा करने की मशीन न होना इत्यादि पर| इसी प्रकार इस कार्यक्रम में भी तो देश की एकता की बात की जा सकती थी, नाकि अपने संगठनो की एकजुटता की| देश में और भी तो ऐसे संगठन, समुदाय और दल हैं जिन्हें मिल कर चलने की हिदायत मिलनी चाहिए थी| क्या उन सबको इस देश के नहीं मानते हमारे आदरणीय मोहन भागवत जी?

                     आज देश में विकास के मुद्दों पर वार्तालाप और चर्चा कर मिलजुल कर चलने की बजाय, जगह-जगह घर वापसी, लव जिहाद, एक दुसरे पर व्यक्तिगत टिपण्णी की जा रही है| हाल ही में दिल्ली में एक ऐसी पार्टी का भारी बहुमत से आगाज़ हुआ है जिसे भाजपा आदि ने कोस कर और हर प्रकार से अपशब्द कह कर भद्दी राजनीती का सर्वोच्च उदाहरण दिया है| किसी को जंगल भेजने की तैयारी की गयी तो किसी को बाजारू समझा गया, किसीने एक तबके को ईश्वर की संतान बताया तो किसी तबके को “हरामज़ादा” तक कहा गया| क्या संघ को यह नहीं कहना चाहिए था की भाजपा और दिल्ली की नयी नवेली पार्टी के उद्देश्य अधिकतर एक ही है, और वह है “दिल्ली और देश का विकास”, जिसे पूरा करने के लिए केंद्र सरकार को, खासकर हमारे देश के प्रधानमंत्री को, अब व्यक्तिगत टिपण्णी करने की बाजाये नयी पार्टी से मिलजुल कर विकास की योजना का खाका तैयार करना चाहिए? आश्चर्य भी होता है और हंसी भी आती है की हमारे ही देश के प्रधानमंत्री ने कहा की देश में पर्याप्त बिजली है, तो क्या दिल्ली देश से अलग है?? आखिर किस आधार पर उन्होंने कहा की जिनके पास बिजली नहीं है वह दिल्ली में 24 घंटे बिजली देने की कवायद करते हैं? दिल्ली को “जनरेटर फ्री सिटी” का वादा तो दिल्ली के ही विधानसभा चुनावो की रैली में मोदी जी ने भी किया था| तो क्या भाजपा के पास पहले से ही बिजली है? यदि भाजपा दिल्ली में काबिज़ हो जाती उसके पास बिजली कहाँ से आती?

                 इसका तो साफ़ अर्थ यह हुआ कि यदि भाजपा दिल्ली में सत्ता पाती तो केंद्र उसका पूरा सहयोग करता, और अब जबकि दूसरा दल काबिज़ है तो उसके सहयोग की जगह उसे नीचा दिखाने का हर संभव प्रयास किया जायेगा| पर क्या कहा जा सकता है| अभी तो फिलहाल भाजपा और उसकी जीत में अभी तक मदमस्त कुछ लोगो की नज़रें महिलाओं की जीन्स और उनके मोबाइल के इनबॉक्स पर गड़ी होने के साथ-साथ बच्चो की गिनती निश्चित करने, और दूसरों के गोत्र पर ऊँगली उठाने के षड्यंत्र बनाने में व्यस्त है|यक़ीनन संघ एक बहुत ही सम्माननीय और देश की प्रगति के प्रति गंभीर रहने वाला संगठन है, किन्तु आये दिन होने वाली घटनाओं पर उसकी इस तरह की प्रतिक्रिया उसकी स्वयं की प्रतिष्ठा पर दाग लगाने के लिए काफी है| संघ और भाजपा यदि इस देश का विकास चाहते हैं और इसे पुनः विश्व की सर्वोच्च शक्ति बनाना चाहते हैं तो उसे सोच समझ कर, देश की जनता की मन की आवाज़ को सुन कर निर्णय लेना होगा, ना की बदले की राजनीती करके|

प्रस्तुति

रीटा चौहान

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