Wednesday, October 17, 2018
Follow us on
Download Mobile App
Revolutionary Poems

आम आदमी तो आम होता है...

November 29, 2014 03:49 PM
अमित कुमार जैन, मुंबई 

 

कभी गुस्सा तो प्यार कभी,सच-झूठ का कारोबार कभी ,
परिवार और रोजी-रोटी, इनका सारा संसार यही,
आजकल ख़बरों में, प्रायः गुमनाम ही होता है....


कुछ गलती, कुछ कमियां तो, सब सवा अरब में पाओगे,
गर ये नहीं,ऐसा नहीं तो, और बेहतर कहाँ से लाओगे?
यहाँ "आम" ही मिलेंगे बाबूजी! "राम" तो बैकुण्ठ में होता है....


कोई बनावट यहाँ नहीं, जैसे दिखते बस वैसे हैं,
हम ऐसे-वैसे-जैसे हैं, पर बिलकुल तेरे जैसे हैं,
हमारे दाग दिखते क्यों हैं, ये हमपे इल्जाम है....


ये अलग लोग, ये अलग सोच, कोई अलग ही इनका देश रहा,
गूंगी इन महलों की दीवारें,अब कहने-सुनने क्या शेष रहा,
अपनों का दर्द बाँटना तो, अपनों का काम होता है....

 

Have something to say? Post your comment