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बातों-बातों में

November 29, 2014 03:10 PM
सुशील देव
 
 
साइलेंट मूव करेंगे मतदाता
 
इसबार भी विधानसभा में आम आदमी पार्टी के ज्यादातर मतदाता साइलेंट मूव करेंगे। चुनावी सरगर्मियों  में जब कोई मतदाताओं के मूड को भांपने के ख्याल से उनके पास जाता है तो वे अपनी भावना का इजहार खुलकर नहीं कर पाते हैं। इसकी कई वजह हैं। कहीं सामाजिकता तो कहीं पड़ोसियों या सगे-संबंधियों की लिहाज, करते हुए अन्य पार्टियों की ओर वे अपना झुकाव दर्शा देते हैं। मगर सच्चाई है कि वे दिल्ली की सत्ता पर अरविंद केजरीवाल सरकार को देखना चाहते हैं। जब उनसे व्यक्तिगत तौर पर बातचीत की जाती है तो वह आम आदमी पार्टी के समर्थन में खड़े दिखाई देते हैं। इसे आप मतदाताओं का अंडर करंट भी कह सकते हैं।
पूर्वांचल के लोगों में खासा उत्साह
दिल्ली के हर चुनावों में वैसे तो पूर्वांचली राजनीति होती है, मगर इस बार आम आदमी पार्टी के साथ उनका झुकाव कुछ ज्यादा ही हैं। अक्सर कांग्रेस या भाजपा में जहां उनके साथ महज तुष्टिकरण की नीति अपनाई जाती है, वहीं आम आदमी पार्टी उनको लेकर उदारवादी रवैया रखती है। अब तक तय उम्मीदवारों में भी ज्यादातर पूर्वांचल के लोगों का खास ख्याल रखा गया है। असल में संगठन के प्रति जवाबदेह, लगनशील और कर्मठ लोगों को आम आदमी पार्टी उम्मीदवार बना रही है। खास बात यह है कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में भी पूर्वांचल के नेताओं से पूर्वांचल के लोगों का मनोबल बढ़ रहा है।  

उल्टा चोर कोतवाल को डांटे
फर्जी वोटर बनाने में राजनीतिक दल इन दिनों उल्टा चोर कोतवाल.. की कहावत चरितार्थ कर रहा है। चोर ही कोतवाल को डांट रहा है कि उसकी कोई गलती नहीं। अब आप ही बताएं, महज दो साल हुए आम आदमी पार्टी को गठित हुए। इससे जुड़े ज्यादातर लोग राजनीति की कुटनीति से भी वाकिफ नहीं। सालों से भाजपा-कांग्रेस ने न केवल शासन किया है, बल्कि वक्त आने पर सारे तिकड़मों की हद पार कर दी हैं। ऐसे में फर्जी मतदाता तैयार होने में उनका पल्ला झाड़ना, कहां तक उचित है? चुनाव के समय तो कुछ ऐसे भी मतदाता हैं जो बड़ी-बड़ी पार्टियों के पैसे खाकर भी आम आदमी पार्टी को ही अपना समर्थन देना उचित समझते हैं।

आप का भी कैडर मतदाता
 
कोई भी राजनीतिक दल इस भुलावे में न रहें कि केवल उन्हीं का कैडर है। महज दो सालों की मेहनत, लगन और ईमानदारी ने आम आदमी पार्टी का भी कैडर तैयार हो चुका है। कैडर, पार्टी की नीति या रीति से अलग नहीं हो सकते। पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसौदिया, संजय सिंह, प्रशांत भूषण, आशुतोष से लेकर हर नेताओं में उनकी प्रखरता को वे परख चुके हैं। उनके बीच काम करके वे बेहद खुश और संतुष्ट हैं। इसलिए इस कैडर को बहलाया-फुसलाया नहीं जा सकता। यही वजह है कि लाख कोशिशों के बावजूद अन्य पार्टियां आप के विधायकों को तोड़ नहीं सकीं और अंततः चुनाव की नौबत आ गई। यह दीगर बात है कि कुछ लोग खोटे सिक्के निकल गए। वैसे भी पांचों उंगलियां बराबर नहीं होती।
उल्टा चोर कोतवाल को डांटे
फर्जी वोटर बनाने में राजनीतिक दल इन दिनों उल्टा चोर कोतवाल.. की कहावत चरितार्थ कर रहा है। चोर ही कोतवाल को डांट रहा है कि उसकी कोई गलती नहीं। अब आप ही बताएं, महज दो साल हुए आम आदमी पार्टी को गठित हुए। इससे जुड़े ज्यादातर लोग राजनीति की कुटनीति से भी वाकिफ नहीं। सालों से भाजपा-कांग्रेस ने न केवल शासन किया है, बल्कि वक्त आने पर सारे तिकड़मों की हद पार कर दी हैं। ऐसे में फर्जी मतदाता तैयार होने में उनका पल्ला झाड़ना, कहां तक उचित है? चुनाव के समय तो कुछ ऐसे भी मतदाता हैं जो बड़ी-बड़ी पार्टियों के पैसे खाकर भी आम आदमी पार्टी को ही अपना समर्थन देना उचित समझते हैं।
सांसदों को उतारने का मतलब
भारतीय जनता पार्टी क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लहर को इतना कमजोर मान रही है कि उसने दिल्ली विधान सभा चुनाव की कमान करीब 300 सांसदों को सौंपने का फैसला किया है? आखिर कितनी कमजोर और लाचार पहलवान है भाजपा, कि अखाड़े में आने पर इतनी हताश दिख रही है। उधर, आम आदमी पार्टी कह चुकी है कि उसे केंद्र से नहीं, राज्य के नेताओं से लोहा लेना है, मगर भाजपा है कि इस लड़ाई में पूरे देश की ताकत झोंक देना चाहती है। वाकई, इतने मजबूत हैं केजरीवाल के यौद्धा? भाजपा सांसदों को सोचना चाहिए कि अगर तब भी उनकी हार हो जाती है तो वे क्या करेंगे? क्या उन्हें चुल्लू भर.....या अपने पद से इस्तीफा नहीं दे देना चाहिए?
 
 
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