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विपरीत परिस्थितियों का दोषी मैं खुद हूँ 

November 25, 2014 08:01 PM

कुँवर आनन्द सिंह 

आज की स्थितियों की तरफ गौर करता हूँ तो इन परिस्थितियों के लिए खुद को जिम्मेदार मानता हूँ। देश  बहुत ही रफ्तार से प्रगति कर रहा है लेकिन उसी रफ्तार से किसान जान गवां रहे हैं। गगन-चुंबी इमारतें, अपना परचम लहरा रही हैं, तो लहलहाते खेत इतिहास बन रहें हैं। रेत का रेगिस्तान सिमट रहा है लेकिन दूसरी ओर काली सड़कों का जाल  फैलता ही जा रहा है। पत्थरों के पहाड़ घट रहे हैं तो कचरे के ढेर प्रतिदिन पहाड़ का रूप धारण कर रहे हैं। गन्दे पानी को साफ करके पी रहे हैं लेकिन प्राकृतिक रूप से पीने योग्य गंगा के पानी को दूषित भी तो हम ही कर रहे हैं। 

हम इतने अन्धे और बेगैरत हो गए हैं कि अपनी विलासिता के लिए प्रकृति से खिलवाड़ कर रहे हैं, उसकी स्थिरता को ललकार कर अपनी मौत को बुलावा दे रहे हैं। मीडिया अपना फर्ज निभा रहा है लेकिन वही अपना टीआरपी बढ़ाने के लिए समाज के असभ्य क्रूर लोगों को रातों रात हीरो बना देते हैं।

                             जनसंख्या बढ़ने की रफ्तार कम हो रही है वहीं वाहनों की संख्या अपनी अधिकतम रफ्तार से भी कई गुना रफ्तार से बढ़ रही है। अर्थातः ‘‘पॉपुलेशन  बैंग’’ का खतरा कम हो रहा है तो ‘‘ पोलूशन  बैंग’’ का खतरा बढ़ रहा है। सेंसेक्स नित नई ऊंचाइयां छू रहा है वहीं गरीबी-अमीरी की खाई बढ़ती जा रही है। अपने कमरे को ठण्डा रखने के लिए पूरी पृथ्वी का वातावरण गरम कर रहे हैं, वृक्षों का वध कर रहे हैं, जो कि सच्चे अर्थों में मनुष्य के लिए जीवन-दायी हैं।
हम इतने अन्धे और बेगैरत हो गए हैं कि अपनी विलासिता के लिए प्रकृति से खिलवाड़ कर रहे हैं, उसकी स्थिरता को ललकार कर अपनी मौत को बुलावा दे रहे हैं। मीडिया अपना फर्ज निभा रहा है लेकिन वही अपना टीआरपी बढ़ाने के लिए समाज के असभ्य क्रूर लोगों को रातों रात हीरो बना देते हैं। हम उन लोगों को अपना रहनुमा बनाकर भेजते हैं जिनको समाज के निर्माण का जरा सा भी ज्ञान नहीं है। ज्ञान हो भी तो वो करना नहीं चाहते क्योंकि उन्हें पता है कि सभ्य और शिक्षित  समाज में उनका कहीं स्थान नहीं हैं। जब भी हम अपना मत प्रयोग करने जाते हैं तो उम्मीदवार के आचरण, शिकक्षण, कर्तव्यनिष्ठा  की जगह उसे बाहूबल, कारों के काफिले और उसके द्वारा खर्च किए गए धन, पिलाई गई शराब का आकलन कर मतदान करते हैं।
                 ये सब हो रहा है.... क्यों-क्योंकि मैं चुपचाप देख रहा हूँ उसे नजर अंदाज कर देता हूँ लेकिन कब तक...सिर्फ मेरा ही नहीं कहीं ना कहीं इन सब स्थितियों-परिस्थितियों को देखकर आपका भी मन व्याकुल होता होगा, व्यथित होते होंगे.... लेकिन कब तक.... एक दिन मैं जरूर बोलूंगा.... परन्तु कहीं देर तो नहीं हो जाएगी?
 
 

 

 
 

 

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